ओम गुरू ओम गुरू ओम गुरू गुरूदेव।- जय गुरू जयगुरू जय गुरूदेव ।
देव हमारा श्री अरिहन्द। – गुरू हमारा सद गुणी सन्त ।।
भयहर भयहर भज भगवान ।-सुर नर मुनिवर धरत हैं ध्यान ।।
सहजानन्दी शुद्ध स्वरूप ।- अविनासी में आत्म-स्वरूप ।।
श्रृषभ जय जय प्रभु पार्श्वव जय जय ।-महावीर जय गुरू गौतम जय जय ।।
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Kanch ka Mandir belonging to Jain religion is famous for its culture and art . It is fully made with glass pieces . It is situated it many parts of India and one of them is in the industrial town of uttar Pradesh known as Kanpur , back of kamla tower . Tourist specially visit Kanpur just to get a glimpse of it .
भारतबर्ष में गुरू- शिष्य परम्परा ——
हमारे भारतबर्ष में गुरू- शिष्य के सम्बन्धों की परम्परा आज की नहीं ,वह तो अनादि है,अनन्त है । मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब गुरूओं की सहज कृपा का ही फल है । इसी सन्दर्भ में ,मैं आपके सामने चार पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूॅ ।
“युग व्यतीत कर आज तुम्हारी गुरूबर । याद जगी है ।
याद करूं सामीप्य तुम्हारा, यही चाह उगी है ।।
गुरू-पद आश्रित जन को,बिष भी देता चिर जीवन है ।
पाकर गुरू पद- धूलि, पतित भी बनती पुण्य – सदन है ।।”
निष्कर्ष यह है कि निर्माण के लिए सर्वत्र प्रहार की आवश्यकता रहती है। प्रहार के बिना निर्माण नहीं होता । गुरू कुम्भकार की
तरह शिष्य को गड़ने के लिए एक ओर प्रहार करता है,दूसरी ओर उसे जोड़ने के लिए हाथ रखता है। व्यक्तित्व के गढ़ने और
उसमें निखार लाने में गुरू की छैनी महत्वपूर्ण कारक होती है । प्रत्येक गुरू अपने शिष्य पर चोट लगाता है । सोने पर चोट
लगती है, तभी उसमें अदभुत निखार आता है । चोट लगने पर ही सोना चमकता है। इसी प्रकार शिष्य भी गुरू की चोट खाकर
चमक उठता है ।
गुरूवर ! मेरी अरस कहानी है, कौन सुनने को ?
किसे समय है , दुखी प्राण के गड़े शूल चुनने को ,
तुम्ही दया के धाम, तुम्ही से प्यार पतित हो मिलता,
पा करूणा कण ‘ अमर मुनि ‘ का विहँसता-खिलता !
सच्चा शिष्य वह होता है,जो गुरू के दिये हुए बोध को संजोकर सुरक्षित रखता है ।जब से वह गुरू के चरणों में आता है,तभी से
कुछ न कुछ लेता ही रहता है।गुरू देने में कोई कमी नहीं रखता । यह शिष्य पर निर्भर करता है कि उसके ग्रहण करने का ह्रदय-
पात्र कितना निशिछद्र है। सद्गगुरू की कृपादृष्टि से असम्भव भी सम्भव है । और इस जीवन में मंगल ही मंगल होता है ।में भी अपने पूज्य गुरूऔं के चरणों में शुभ संकल्प के साथ श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ ।
किसी व्यक्ति का नहीं ,किन्तु संपूर्ण रूप से विकसित और विकासमान विशुद्ध आत्मस्वरूप का ही दर्शन,स्मरण,चिन्तन,ध्यान
एवं अनुभव किया जाता है। इसलिए यह अनादि और अक्षयस्वरूपी मंन्र है ।
लौकिक मन्त्र आदि सिर्फ़ लौकिक लाभ पहँुचाते हैं, किन्तु लोकोतर मंन्र लौकिक और लोकोतर दोनों कार्य सिद्ध करते हैं ।
इसलिए णमोकार मंन्र सर्वकार्य सिद्धकारक लोकोतर मंन्र माना जाता है ।
णमोकार- स्मरण से अनेक लोगों के रोग,दरिद्रता,भय,विपत्तियाँ दूर होने की अनुभव सिद्ध घटनाएँ सुनी जाती हैं । मन चाहे
काम आसानी से बन जाने के अनुभव भी सुनें हैं । अत: यह निश्चित रूप में माना जाता सकता है कि णमोकार मंन्र हमें जीवन
की समस्याओं, कठिनाइयों ,चिंन्ताओं, बाधाओं से पार पहुँचाने में सबसे बड़ा आत्मसहायक है । इसलिए इस मंन्र का नियमित
जाप करना बताया गया है ।
इस महामन्त्र को जैन धर्म के अनुसार सबसे प्रभावशाली माना जाता है ।ये पाँच परमेष्टी हैं ।इन पवित्र आत्माओं को शुद्ध
भावपूर्वक किया गया,यह पंच नमस्कार सब पापों का नाश करने बाला है । संसार में सबसे उत्तम मंगल है । इस मंन्र के
प्रथम पाँच पदों में ३५ अक्षर और शेष दो पदों में ३३ अक्षर हैं । इसतरह कुल ६८ अक्षरों का यह महामन्त्र समस्त कार्यों को
सिद्ध करने वाला व कल्याणकारी अनादि सिद्ध मन्त्र है। इसकी आराधना करने वाला स्वर्ग और मुक्ति को प्राप्त कर लेता है।
सबसे बढ़कर है नवकार,करता है भवसागर पार ।
चौदह पूरब का यह सार, बारम्बार जपो नवकार ।।

