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नवकार मंत्र की महिमा:————

नवकार मंत्र है महामंत्र,इस मंत्र की महिमा भारी। आगम में कथी गुरूवर से सुनी,अनुभव में जिसे उतारी है।। ‘अरिहंताणं’ पद पहला है,अरि आर्ति दूर भगाता है। ‘…

नवकार मंत्र की महिमा:————

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प्यारी बेटी अश्विका हँसते गाते मुस्कराते केसे बीत गये यह सोलह साल ।पता ही नहीं चला केसे बीत गया यह बचपन।इसी जन्मदिन के शुभावसर पर तुमको प्यार एवं बधाई।आज तुम तेज़ी से आगे आगे बढ़ती चली जा रही हो अपने ध्येय को प्राप्त करने के लिये।मेरा आशीर्वाद है कि तुम इसी तरह सबका प्यार पाते हुए आगे बड़ती रहना और सुख पाती रहना। तुम्हारी नानी

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प्रिय बेटी अश्विका के १६ वें जन्मदिन पर बधाई सन्देश :—

मेरी प्यारी बेटी अश्विका आज तुम्हारा १६वाँ जन्मदिन है,अत: तुमको ढेर सारी बधाईयाँ एवं प्यार।बेटी यही मेरा आशीर्वाद है कि जीवन भर स्वस्थ रहते हुये खुश रहो, हँसती हँसाते एवं खिलखि

लाते रहते हुये, ख़ुशियाँ बाँटती रहो।यूँ ही सितारों की तरह जगमगाती रहो और इस ख़ास दिन तुमको सम्पूर्ण परिवार का प्यार दुलार मिले।इसी प्रकार

प्रत्येक क्षेत्र में ज्ञान प्राप्त करते हुये अपना नाम रोशन करो।इस जीवन में तुमको ख़ुशियाँ मिलें हज़ार ,यही हम दुआ करते बारम्बार ।इसी आशीर्वाद के साथ:— नाना (जगदीश प्रसाद जैन)

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एक प्यारी सी नन्हीं सी कली, आज विकसित होकर फूल सी खिली,बचपन से ही जिसने सबका मन मोहा,प्यारा सा मुखड़ा सबके जिगर का टुकड़ा मुस्कराती खिलखिलाती,आगे बड़ती चली, जब उसका आया पचास वाँ जन्मदिवस,हम सबकी दुआ यही फूले फले खिले हमेशा -मम्मी सुमन जैन

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बेटी गोरी के५०वें जन्मदिन पर बधाई सन्देश:-

प्यारी बेटी गोरी ५० वे जन्मदिन की हार्दिक शुभकामना एवं ढेर सारा प्यार।मेरा शुभाशीष है कि

जीवन भर स्वस्थ रहते हुये खुश रहो और सम्पूर्ण परिवार के साथ ख़ुशियाँ बाँटती रहो।प्रिय बेटी हम तुमको पाकर अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं।तुम्हारी यही विशेषता है कि तुमने अपने सम्पूर्ण परिवार एवं अपने माता पिता के साथ खुश रहते हुये समर्पण के साथ कर्तव्य निभाया है।तुम्हारे अन्दर ईश्वर के प्रिति दृढ़ आस्था एवं विश्वास है जिसके कारण तुम्हारी मम्मी इस कोविड १९ की महा संक्रमण की बीमारी से ठीक होकर विजेता बनी।तुम्हारी एवं तुम्हारे जीवन साथी प्रिय बेटे विवेक की कहाँ तक ख़ूबियाँ का वर्णन करूँ कि हम जैसे सूफ़ी माँ बाप को अमेरिका (विशेष रूप से केलीफोरनियाँ )जैसे विशाल

देश में (६) बार तीन से छे: माह तक रहने ,घुमाने एवं प्रतेक प्रकार के खेल तमाशे (लास वेगास एवं डिज़्नी लेन्ड एवं न्यागरा फौल्स) आदि अनेक रमणीक स्थानों को दिगदर्शन का सोभग्गय प्राप्त कराया।केलीफोरनियाँ के शहर कूपरटीनो के तुम्हारे अपने निजी घर पर हमेशा तुम हँसते नाचते और सबको हँसाते रहते प्यार से अच्छे अच्छे स्वादिष्ट वयन्जनों को खिलाती थीं।जब हम इन पुरानी बातों को याद करते हैं तो गदगद हो जाते हैं।तुम्हारी विशेषताओं के साथ साथ दोनों बच्चे बेटा वर्धन एवं बेटी अश्विका अपने नानी नाना से बेहद प्यार करते हैं और तुम्हारे द्वारा दिलाएे गये आईपैड पर लिखने पड़ने का ज्ञान भी इन्हीं बच्चों ने कराया और अब भी कराते रहते हैं।अब मेरे पास तुम्हारे प्यार और ख़ूबियों को बताने के लिये शब्द नहीं हैं अत: में तुमको पुन: दिल से जन्मदिन की बधाई एवं आशीर्वाद चन्द लाईनों द्वारा दे रहा हूँ:—“ जैसे खिले फूल आँगन में , तुम आ खिलीं मेरे आँगन में ,जैसे महके ख़ुशबू फूलों की,जीवन में महकती ख़ुशबू बिटियों की “ तुम्हारे पापा -जगदीश प्रसाद जैन

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मेरी पत्नी सुमन जैन का विश्व की भयानक महामारी कोविड-१९ के संक्रमण से विजेता के रूप में अपने आत्मबल एवं परिवार के पूर्ण सहयोग से ख़ुशियाँ प्रदान कर रही हैं!

13th.April 2021 को प्रथम बार मेने एवं सुमन जैन ने कोविड-१९ का कानपुर में टेस्ट कराने पर ज्ञात हुआ कि हम दोनों कोविड पोजेटिब है।इसके पश्चात हम दोनों अपने कमरे अलग परिवार से दूर रहने का प्रयास किया।और इसके लिये मैडीकल ट्रीटमेंट शुरू कर दिया।मुझे कोविड का पोजेटिब असर कम था,क्योंकि में कोवेक्सीन का प्रथम इन्जेक्शन प्रयागराज में लगवाकर कानपुर आया था।मेरी पत्नी सुमन चट जैन ने कोविड का टीका नहीं लगवाया था,इसकी वजह से इनको इस संक्रमण का बहुत भंयकर असर हुआ, जिसकी बजह से शुरू में तो घर पर ही मेडीकल ट्रीटमेंट शुरू किया गया किन्तु इस संक्रमण से घर पर इलाज से कोई सुधार नहीं हो रहा था।फिर बड़े प्रयास और शिफारिस के द्वार इनको चाँदनी नर्सिंग होम में भर्ती करवाया गया।तारीख़ २५/४/२०२१ को श्री महवीर जंयन्ती बाले दिन चाँदनी नर्सिंग होम में भर्ती करवा दिया।इस नर्सिंग होम को सरकार की तरफ़ से कोविड की मान्यता मिली हुई थी।इनको इस कोविड संक्रमण की बजह से बहुत पीड़ा थी ,जिसकी बजह से मुझे एवं पूरे परिवार को इनके संक्रमण की पीड़ा एवं कठिन दौर से गुज़र रहीं थी,इस कठिन दौर में मेडीकल ट्रीटमेंट एवं ईश्वर की प्राथना के अतिरिक्त कोई उपचार नहीं था।अन्तोगत्वा ईश्वर ने एवं उपयुक्त मेडीकल ट्रीटमेंट के उपाय के द्वारा इस संक्रमण से ठीक होना शुरू हो गया।और नर्सिंग होम से इनको तारीख़ ३/०५/२०२१ को घर पर ले आये।सुमन की जिद्द की वजह से ,इनको नर्सिंग होम से शीघ्र तारीख़ ०३/०५/२०२१ को डिसचार्ज कराके ,घर पर ही नर्सिंग की पूरी व्यवस्था का प्रबन्ध किया गया और २४ घंटे के लिये दो नर्सिंग सिस्टर्स की रहने एवं खाने की वयवस्था की गई।इस व्यवस्था को ठीक प्रकार से चलाने के लिये संक्रमण जैसे वातावरण में मेरे पुत्र विक्रम जैन,पुत्र वधू सीमा जैन एवं मेरी सर्वगुण स्मपन्न नातिन वेदिका जैन के साहस पूर्ण सहयोग की वजह से ही घर पर सफलता पूर्ण नर्सिंग एवं आक्सीज के भरे हुये सिलेन्डरो का बराबर नियमित मरीज़ के लिये इस कठिन कार्य का प्रबन्ध होना एक बड़े चेलेन्ज से कम नहीं था।अगर आधी रात्रि में आक्ससीजन सिलेण्डर समाप्त होने पर,उसी समय दूसरा आक्सीजन भरा हुआ बदलने के मुश्किल कार्य को करना ,यह ईश्वर एवं इन आग्याकारी बच्चों की साहस के कारण ही मुमकिन हो सका।इसी प्रकारप्रयागराज में रह रही दोनों बेटियों के परिवार के प्रतेक सदस्य केअथक प्रयासों एवं केलिफोरनियाँ अमेरिका में निवास कर रही छोटी बेटी गौरी की पूजा पाठ के परिणाम स्वरूप ही आज इन सबकी मम्मी सुमन जैन अपने साहस के कारण इस कोविड की महामारी संक्रमण से विजेता के रूप में हम सबके साथ पूर्णरूपेण स्वस्थ हो गई हैं।

,मेरी पत्नी सुमन जैन कोविड-१९ की महामारी के महासंक्रमण पर विजय प्राप्त कर तारीख़ ०३/०५/२०२१ को अपने जन्म दिन के शुभावसर पर चाँदनी नर्सिंग होम से छुट्टी प्राप्त कर, अपने सिविल लाईन्स निवास स्थान पर साँयकाल सकुशल पहुँच गई।अपने बच्चे विक्रम,सीमा एवं प्यारी बेटी वेदिका जैन के अथक एवं स्नेहपूर्ण प्रयासों की वजह से घर पर ही पूर्ण नर्सिंग की व्यवस्था करके ,आगे के इलाज के द्वारा पूर्ण रूप से स्वस्थ करा दिया।

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My trips to the USA

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तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी जी के ऊपर गौशालक ने तेजोलेश्या छोड़ी :-

श्री सिंह अणगार
महावीर प्रभु के एक दृढ़ अनुरागी शिष्य – सिंह अणगार ।
एकांत निर्जन अरण्य में एक घटादार वट वृक्ष के नीचे ध्यान धर रहे थे ।
भगवान पर गौशालक ने तेजो लेश्या छोड़ी उसकी बात वहाँ पर दो पुरुष कर रहे थे ।
एक पुरुष कह रहा था – भगवान पर गोशालक ने जब तेजोलेश्या छोड़ी तब उनके समर्थ शिष्य गौशालक को क्यों नहीँ रोक सके ????
दूसरे ने उत्तर दिया – भगवान की आज्ञा थी , L

सब गौशालक न सॆ दूर रहें , फिर भी उसने तेजोलेश्या छोड़ी तब परमात्मा सॆ प्रीति रखने वाले दो अणगार सुनक्षत्र और सर्वानूभूति थमे ना रहे और गोशाले को अटकाने के लिए बीच मॆं कूद पड़े लेकिन तेजोलेश्या सॆ जलकर दोनों जलकर मौत की भेंट चढ़ गये
अररर….. घोर हत्या…
उस पापी दिन को ये दोनों पुरुष श्रीवस्ती नगर मॆं थे जब गोशाले ने प्रभु महावीर पर तेजोलेश्या छोड़ी थी ….
लेकिन….
तेजोलेश्या परमात्मा की देह मॆं प्रवेश करने के लिए समर्थ न थी ।
भगवान की प्रदक्षिणा देकर सीधी ही गौशालक की देह मॆं फैल गई ।
लेकिन….इस तेजोलेश्या की गर्मी सॆ भगवान के अंग अंग मॆं जलन होने लगी ।
भगवान की रूप कांति थोड़ी सी कमज़ोर हो गई थी ।सब भक्तगण इस आफत सॆ हड़बड़ा गये थे ।।
सिंह अणगार वट वृक्ष के पीछे ध्यान कर रहे थे ।
उन्होंने यह वार्तालाप सुना….उन्हें इस भयंकर बात की जानकारी नहीँ थी लेकिन इस बात को सुनकर उनके दिल मॆं अपार पीड़ा हुई । अपनी कल्पनाशक्ति सॆ परमात्मा की रोग ग्रस्त देह को देखा ।
वे कांप उठे , मेरे नाथ…..!!!!! आपकी देह मॆं इतनी सारी पीड़ा ??
सिंह अणगार की आँख सॆ अश्रुधारा बहने लगीं ।।
थोड़ी देर बाद अन्य दो मुसाफिर उसी वट वृक्ष के नीचे आकर बैठ गये..दोनों मॆं सॆ एक वृद्ध था और एक बालक था । शायद पिता पुत्र होंगे ।
बालक वृद्ध सॆ पूछ रहा था , “हे पिताजी !!! भगवान पर गोशाले ने तेजोलेश्या छोड़ी ,उस तेजोलेश्या सॆ क्या होता है ??”
वृद्ध कहता है – ” यदि यह तेजोलेश्या अन्य किसी पर छोड़ी गई होती तो वो तुरंत जलकर खाक हो जाता..लेकिन ये तो तीर्थंकर थे ,इसलिए उनकी मृत्यु न हुई लेकिन….”
इतना कहते हुए वृद्ध का हृदय भर आया ।
वह अधिक न बोल सका । बालक ने कहा , ” पिताजी !!! अटक क्यों गये ?? बाद मॆं क्या हुआ ??
बेटा भगवान को खून के दस्त हो रहे हैं ।”
इतना कहते हुए वृद्ध सिसक कर रो पड़ा । पास खड़े सिंह अणगार दौड़कर आये । वार्ता सुनकर उनके हृदय में भयंकर पीड़ा उमड़ पड़ी थी ,अश्रु धारायें बह रहीं थी ।उन्होंने पूछा : “भाई तत्पश्चात क्या हुआ ??
भगवान का निर्मल चंद्रमा जैसा मुख तेजोलेश्या के ताप सॆ श्याम हो गया है ।भगवान के पूरे शरीर में पीडा हो रही है ।इस गर्मी सॆ प्रभु छह माह सॆ अधिक नहीँ जी सकेंगे “
वृद्ध इससे आगे कूछ नहीँ कह सका ।
सिंह अणगार की पीड़ा बढ़ती गई ।प्रभु ये सब कैसे सहन करते होंगे ?? अधिक सॆ अधिक वे शोक सागर में डूबते गये ।
एक कोने में बैठ कर वे करुण रुदन करने लगे ।
उस वक्त सब रो रहे थे – गौतम स्वामी सॆ लेकर प्रत्येक साधु की आँखें भर आई थी । चन्दनबाला और दूसरे अन्य स्त्री – पुरुष -देव और दानव भी शोक की छाया में घिर पड़े थे ।
सिंह अणगार तो ऐसे रोए कि चुप ही ना हो सके ।
भगवान महावीर श्रीवस्ती सॆ विहार करके मिन्ढिक गाँव पधारे । वहाँ केवलज्ञान के प्रकाश में उन्होंने सिंह अणगार के आक्रंद सॆ तड़पते हुए जीव को देखा ।
भगवान ने तुरंत गौतम स्वामी को बुलाकर सिंह अणगार को ले आने की आज्ञा दी । थोड़े ही समय में दो अणगारो ने सिंह अणगार को भगवान के चरणों में उपस्थित किये ।
भगवान की पीडित देह पर नज़र पड़ते ही उनकी पीड़ा बढ़ गई । वे नीचे बैठ गये । कंठ भर आया ।
आँखे सूज गई थी ।
सिंह !!!” मधुर वाणी सॆ भगवान ने अणगार को नज़दीक बुलाया ।
प्रभु !! आपको इतनी सारी पीड़ा ??” रोते रोते उत्तर दिया ।
प्रभु बोले : “सिंह लोगों के मुख सॆ तूने सुना है ना कि छह महीनों में मॆरी मृत्यु हो जायेगी ।”
हाँ प्रभु
लेकिन वाक़ई ऐसा हो सकता है ?? तीर्थंकर हमेशा अपना आयुष्य पूर्ण करके ही निर्वाण पाते हैं । उनके आयुष्य को ना कोई घटा सकता है , ना कोई बढ़ा सकता है ।”
लेकिन प्रभु !!” अणगार रोते रोते गिड़गिड़ाए , “सकल संघ आपकी स्थिति देखकर व्यथित हो रहा है ।”
प्रभु !!स्वयं के लिए नहीँ तो हमारे मन की शांति के लिए आप औषध सेवन करिये ।
आपकी पीड़ा क्षणमात्र देखने के लिए मैं समर्थ नहीँ हूँ ।”
सिंह मुनि के ऐसे आग्रह सॆ प्रभु ने कहा : इस गाँव में रेवती नामक श्राविका ने मेरे लिए कद्दू का कटाह पकाया है , वह तु मत लेना ,लेकिन उसने अपने लिए बीजोरे का कटाह पकाया है वह ले आ । तेरे आग्रह सॆ वह कटाह मैं औषध के रुप में लूँगा जिससे तुझे धैर्य प्राप्त होगा ।
सिंह अणगार नाच उठे । उनका अंग अंग हर्ष सॆ रोमांचित हो उठा । रेवती का ठिकाना ढूंढकर सिंह अणगार उसके आँगन में पधारे ।
विनयपूर्वक रेवती ने वंदना की । हाथ जोड़कर पूछा :”कहो भगवन !! पधारने का कारण ??”
हे श्राविका !!तूने भगवान के लिए जो औषध बनाया है वह नहीँ परंतु जो तेरे स्वयं के लिए औषध बनाया है , उसकी हमें ज़रूरत है ।”
रेवती आश्चर्यचकित होकर बोली ” हे भगवन !! कौन ऐसे दिव्यज्ञानी हैं जो इस बात को जानते हैं ??”
सर्वज्ञ भगवान के सिवा अन्य कौन हो सकता है रेवती !!”
रेवती ने आनंदपूर्वक वह औषध सिंह अणगार को अर्पण किया । और जैसे ही पात्र में औषध गिरा , देवों ने महादानम महादानम का दिव्यध्वनि किया ।
सिंह अणगार त्वरित गति सॆ भगवान के पास आये और भगवान को औषध का आहार कराया ।
अल्पकाल में भगवान की देह रोग मुक्त हो गई ।
चतूर्विध संघ ने आनंद उत्सव मनाया ।
सिंह अणगार की आँखों सॆ हर्ष के अश्रु की धारा बह रही थी और मुख भगवान के सामने मुस्कुरा रहा था ।।
जिन आज्ञा विरुद्ध कुछ लिखा हो तो मिच्छामि दुक्कडम्…..
❄❄जैन धर्म प्रभावना व् जैन धर्म से जुडी सारी खबर, रोचक तथ्य, ज्ञानवर्धक लेख, नैतिक जीवन की सीख, जैन धर्म का इतिहास, साधुओं के जीवन चरित्र आदि सभी महत्वपूर्ण updates के लिए Light of Universe – Jainism. का यह PAGE जरूर लाइक करे, share करें व अपने सभी मित्रगणों को भी बताये।।
जय श्री आदिनाथ…
जय श्री शत्रुजंय…
संसार एटले फरवानुं स्थान अने मोक्ष एटले ठरवानुं स्थान …
आप सभी को विशेष आग्रह
आप ये सन्देश 20 लोगो तक भेजे।।

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जैन धर्म के चौंबीसवे (२४ वे ) तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी जी का जीवन परिचय

पू. भगवान महावीर जैन धर्म के चौंबीसवें (२४वें) तीर्थंकर है। भगवान महावीर का जन्म करीब ढाई हजार साल पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व), वैशाली के गणतंत्र राज्य क्षत्रिय कुण्डलपुर में हुआ था। तीस वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्मकल्याण के पथ पर निकल गये।

जन्म

भगवन महावीर का जन्म ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली गणतंत्र के कुण्डलपुर में इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहाँ चैत्र शुक्ल तेरस को हुआ था। ग्रंथों के अनुसार उनके जन्म के बाद राज्य में उन्नति होने से उनका नाम वर्धमान रखा गया था। जैन ग्रंथ उत्तरपुराण में वर्धमान, वीर, अतिवीर, महावीर और सन्मति ऐसे पांच नामों का उल्लेख है।[3] इन सब नामों के साथ कोई कथा जुडी है। जैन ग्रंथों के अनुसार, २३वें तीर्थंकर पार्श्वनाथजी के निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त करने के 188 वर्ष बाद इनका जन्म हुआ था।[4]

विवाह

दिगम्बर परम्परा के अनुसार महावीर बाल ब्रह्मचारी थे। भगवान महावीर शादी नहीं करना चाहते थे क्योंकि ब्रह्मचर्य उनका प्रिय विषय था। भोगों में उनकी रूचि नहीं थी। परन्तु इनके माता-पिता शादी करवाना चाहते थे। दिगम्बर परम्परा के अनुसार उन्होंने इसके लिए मना कर दिया था।[5] श्वेतांबर परम्परा के अनुसार इनका विवाह यशोदा नामक सुकन्या के साथ सम्पन्न हुआ था और कालांतर में प्रियदर्शिनी नाम की कन्या उत्पन्न हुई जिसका युवा होने पर राजकुमार जमाली के साथ विवाह हुआ। [note 1]

तपस्या

भगवान महावीर का साधना काल १२ वर्ष का था।[7] दीक्षा लेने के उपरान्त भगवान महावीर ने दिगम्बर साधु की कठिन चर्या को अंगीकार किया और निर्वस्त्र रहे। श्वेतांबर सम्प्रदाय जिसमें साधु श्वेत वस्त्र धारण करते है के अनुसार भी महावीर दीक्षा उपरान्त कुछ समय छोड़कर निर्वस्त्र रहे और उन्होंने केवल ज्ञान की प्राप्ति भी दिगम्बर अवस्था में ही की। अपने पूरे साधना काल के दौरान महावीर ने कठिन तपस्या की और मौन रहे। इन वर्षों में उन पर कई ऊपसर्ग भी हुए जिनका उल्लेख कई प्राचीन जैन ग्रंथों में मिलता है।

केवल ज्ञान और उपदेश

इन्हें भी देखें: जैन धर्म में भगवान

जैन ग्रन्थों के अनुसार केवल ज्ञान प्राप्ति के बाद, भगवान महावीर ने उपदेश दिया। उनके ११ गणधर (मुख्य शिष्य) थे जिनमें प्रथम इंद्रभूति थे।[8]

जैन ग्रन्थ, उत्तरपुराण के अनुसार महावीर स्वामी ने समवसरण में जीव आदि सात तत्त्वछह द्रव्य, संसार और मोक्ष के कारण तथा उनके फल का नय आदि उपायों से वर्णन किया था।

महावीर
चौबीसवें तीर्थंकर

पहाड़ पर उकेरी गयी तीर्थंकर महावीर की आकृति (तमिल नाडु)
विवरण
अन्य नामवीर, अतिवीर, वर्धमान, सन्मति
एतिहासिक काल५९९-५२७ ई.पू.
शिक्षाएंअहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद
पूर्व तीर्थंकरपार्श्वनाथ
गृहस्थ जीवन
वंशइक्ष्वाकु
पिताराजा सिद्धार्थ
मातात्रिशला
पंचकल्याणक
जन्मचैत्र शुक्ल त्रयोदशी
जन्म स्थानकुंडलग्राम, वैशाली के निकट
मोक्षकार्तिक अमावस्या
मोक्ष स्थानपावापुरी, जिला नालंदाबिहार
लक्षण
रंगस्वर्ण
चिन्हसिंह
ऊंचाई६ फीट (७ हाथ)
आयु७२ वर्ष
शासक देव
यक्षमातंग
यक्षिणीसिद्धायिका
गणधर
प्रथम गणधरगौतम गणधर
जैन धर्म

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