” तुम मेरे गीतों की परछाईं सी, दिन भर सुधियों के संग संग फिरती हो ।
Author: jagdishjain
89 years old, I am MA in History, have always been interested in politics so in the old fashioned style have been to Jail, while involved in political protests. Have studied law from Agra. Was a law secretary and was so involved in the union that didn't pass my exam. A strong follower of Jainism and have been interested in all religious discourse. Have been married since 1957; my wife has been very lucky for me who is also quite a writer and poet
Interests Reading History, writing about my family history, taking part in local politics
जैन धर्म के महामंत्र की आरती:–
दर्शन ज्ञान अनन्ता, शक्ति के धारी, स्वामी ! यथा ख्यात- समकित हैं, कर्म शत्रु हारी ।।१।।(ऊँ जय)
है सर्वज्ञ- सर्वदर्शी-बल, सुख अनन्त पाये, स्वामी ! अगुरू लघु – अमूरत, अव्यय कहलाये।।२।।(ऊँ जय)
नमो अायरियाणं, छत्तीस गुण पालक, स्वामी ! जैन धर्म के नेता ! संघ के संचालक ।।३।। (ऊँ जय)
नमो उवज्झा़याणं , चरण करण ज्ञाता, स्वामी ! अंग उपांग पढ़ाते ज्ञान दान दाता ।।४ ।। (ऊँ जय)
नमो लोए सव्वसाहूणं , ममता- मद हारी, स्वामी ! सत्य अहिंसा- अस्तेय ब्रह्मचर्य धारी ।।५ ।।(ऊँ जय)
‘चौथमल’ कहे शुद्ध मन जो नर ध्यान धरे, स्वामी ! पावन पंच सरमेष्टी, मंगलाचार करे ।।६।। (ऊँ जय)
दोहा—————–
ीी राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार । मरना सबको एक दिन अपनी- अपनी बार ।।
दल बल देवी देवता , मात-पिता परिवार । मरती बिरिया जीव को,कोई न राखनहार ।।
दाम बिना निर्धन दु:खी , तृष्णावश धनवान ।कहुँ न सुख संसार में,सब जग देख्यो छान ।।
आप अकेला अवतरे, मरे अकेला होय ।यों कबहुँ या जीव को,साथी सगो न कोए। ।।
जहाँ देह अपनी नहीं, तहाँ न अपना कोय ।घर सम्पत्ति प्रकट ये,पर हैं परिजन लो़़य ।।
दिपे चाम चादर मढ़ी ,हाड़-पिंजरा देह ।भीतर या सम जगत में,और नहीं घिन-देह ।।
प्राथना और सेवा ———–
प्राथना हमारे भीतर का एक एेसा अनूठा भाव है,जो उनलोगों के शुख शान्ति और कल्याण के लिए जगता है,जो लोग हमारी
ज़िन्दगी के दायरे से संबन्धित नहीं हैं । हमारी सोच,हमारी कल्पना,हमारी कामनाओं से भी दूर है , उनकी सुख शान्ति चाहना
बहुत श्रेष्ठ भाव है ।
और सेवा ? सेवा भी प्राथना जैसा ही श्रेष्टतम भाव है जो सक्रिय होकर उन तक पहंुचता है , जो हमारे जीवन
के निकट है,हमसे सम्बन्घित है ओर हमारे आस पास है ।उन्हें ऊँचा उठाने के लिए रचनात्मक रूप से सहयोगी बनता है ।
सेवा का पवित्र भाव हमें संवेदनशील बनाता है ।हमें उस तरफ़ ले जाता है जहाँ हमारी शक्ति का सही उपयोग होता है । दूसरी
ओर सेवा भाव हमारे जीवन की विसंगतियों को दूर करता है ।हमें उसके अभिमुख करता है ,जिसकी हम प्राथना करते हैं ।
संक्षेप में कह सकते हैं ,सेवा जगत और जगदीश्वर से जोड़ने वाला सेतु है ।
My wife and I along with my younger daughter Gauri & her husband Sri Vivek Agarwal & both her
Children had taken a trip to Monterey Whale ( Humpback Whale ) Watch on 11th August,
2011 at Monterey Bay to observe the spectacular diversity and abandance of Whales and
Dolphins inhabiting the Bay.
The Monterey is the best place in the USA to view a variety of Marine Mammals and seabirds.
My Boat Driver (Captain) John Skipper was a old man with 30 years Experience ,who fully narrates excellent views of Marine Wildlife.My most skilled Captain knew where to find Humpback Whales and how to approach them. He merely with a quick glimpse of a
Humpback Whale of above 55 Tons of weight and about 50 Ft. Long, drove us 10 kms
inside the Monterey Sea. Thats why we were considered the best of the Whale Watches in the Monterey Bay.
By Jagdish Prasad Jain .
उपवास—- सिद्धान्त एवं प्रयोग
उपवास का लक्ष्य प्राय: शरीर संस्थान को विश्राम देना होता है । उपवास गौण रूप में शारीरिक तथा मुख्य रूप में आध्यात्मिक
उद्देश्य से प्रेरित होता है । उपवास दो शब्दों का योगिक रूप है । उप और वास । उप का अर्थ है पास और वास का बैठना या
वास करना । उपवास का अर्थ उस भगवान की निकटता पाना है, जो शक्ति, ज्ञान और आनन्द का अक्षय भण्डार है ।अगर
हम उपवास करने की सही विधि जानकर इसे अपनाएें,तो जिस प्रकार आग के पास बैठने से हम उसके गुण उष्णता का अनुभव
करते हैं,उसी प्रकार भगवान के पास बैठने से हमें उसके गुण शक्ति,ज्ञान,आनन्द की अनुभूति हो सकेगी । परन्तु आम तौर पर
उपवास से भोजन- त्याग मात्र तथा पाचन संस्थान को विश्राम देने का ही अर्थ लिया जाता है ।
यत्र- तत्र ऐसे अनेक उदाहरण पाये जाते हैं कि भोजन जीवनी शक्ति उत्पन्न नहीं करता, वह केवल शरीर निर्माण का तत्व है ।
इस प्रकार भोजन न करने से शरीर का वजन भले ही कम हो जाय, पर जीवनी शक्ति का ह्रास नहीं होता, यह निर्विवाद है ।
इस शरीर में जीवनी शक्ति मुख्यत: दो प्रकार के कार्य करती है । पहला शरीर में भोजन देने पर प्रथमिकतापूर्वक उसका पाचन
करती है, दूसरा शरीर में मल का शोधन करती है ।
उपवास में जब हम एक समय, एक दिन या लम्बे समय तक भोजन नहीं लेते तो जीवनी शक्ति पाचन के भार से मुक्त होकर
शरीर में जमा मल का शोधन करती है और ईश्वरीय प्राण शक्ति का प्रकट्य होता है । इसप्रकार उपवास के सिद्धान्त को
समझकर प्रयोग करने से जीवनी शक्ति जाग्रित होगी तथा आरोग्य के साथ साथ ईश्वरीय शक्ति व आनन्द की भी अनुभूति होगी ।।
हरियाणा राज्य के नारनौल जनपद में “गोधा” एक छोटा सा सुन्दर गाँव है।इस पावन भूमि “गोधा” में पूज्य गुरूदेव
उपाध्याय अमरमुनि महाराज का जन्म सन १९०३ई. शरद् पूर्णिमा को हुआ था।आपके माता पिता धार्मिक प्रवृति के,सदाचार
एवं सुसंस्कार के अाग्रही,साधु सन्तो के प्रति अपूर्व श्रद्धा भाव से समर्पित रहे। माता पिता के धर्मपरायणता और सदगुणों का
गहरा प्रभाव बालक अमरसिंह पर पड़ा।
नारनौल सनातन धर्मावलम्बियों तथा आर्य समाज का प्रमुख केन्द्र था। जैन संत भी यदा कदा आया करते थे।संयोग से
एक बार पूज्य श्री मोतीराम जी महाराज (दादा गुरू) और जैन संत पूज्य पृथ्वीचन्द्र जी महाराज (गुरू)नारनौल पधारे।बालक
अमर सिंह अपने पिता जी के साथ महाराजश्री के दर्शनार्थ आये ।भविष्यदर्शी पूज्य मोतीराम जी महाराज बालक के दिव्य
आभामंडल से अभिभूत हुए। उन्होंने पिता श्री लाल सिंह जी से कहा- इस दिव्य ज्योति ने विश्व कल्याण हेतु जन्म लिया है ।
नररत्न पारखी मुनिद्व़य के श्री चरणों में पिता ने बालक को अर्पण किया ।बालक अमर ने अपने सदव्यवहार,अपनी ज्ञान पिपासा,
अपनी निश्छल मंत्र-मुग्ध वाणी से गुरू एवं दादा गुरू को मोहित करते हुए अमर होने के लिए अपनी अमर यात्रा प्रारंभ की।
मुज़फ़्फ़रनगर स्थित गंगेरू गाँव की पावन धरा पर विक्रम संवत १९७६ माघ शुक्ला दशमी के मंगलमय दिन माता पिता एवं
परिवार के साथ गुरूवरों के आशीर्वाद एवं हज़ारों भाई बहनों की शुभकामनाओं के साथ तेजस्वी किशोर”अमर सिंह” प्रव्रजित
होकर ” अमर मुनि ” बन गया।श्वेत परिधान में उनकी मुखाकृति अद्भुत तेज से तेजोमय हो उठी।अब अध्ययन का क्रम और तेज
हो गया।अनेक शास्त्र एक के बाद एक कण्ठस्थ कर लिए,किन्तु साहित्य तथा भाषा के संबन्ध में अध्ययन नहीं हुआ था ।
अत:किशोर अवस्था में संन्यास लेकर क्रान्ति का शंखनाद किया।प्रचलित परम्परा को पार करके संस्कृत पाठशाला में जाकर
संस्कृत भाषा का अध्ययन किया ।साम्प्रदायिकता के विद्वेष को ख़त्म करने के लिए सादड़ी भीनासर,सोजत अजमेर आदि
क्षेत्रों में सम्मेलनों का आयोजन कराकर साम्प्रदायों का विलीनीकरण किया।उपेक्षित साध्वी-वर्ग,महिलाओं बालिकाओं की
शिक्षा में बढ़ने के लिए प्रेरित किया ।
वर्ष १९५० में स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा़़.राजेन्द्र प्रासाद ने गुरूदेव को राष्ट्रपति भवन में आमन्त्रित किया था।दो घण्टे तक
अहिंसा के व्यावहारिक रूप,बिहार की गौरवमयी परम्परा,भारतीय इतिहास आदि विषयों पर गम्भीर चर्चा हुई।वर्ष १९७० में
दीक्षा-स्वर्ण जयंति समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने श्रद्धा- भाव अर्पण करते हुए उन्हे “राष्टसंत” की
उपाधि से अलंकृत किया ।
मातृजाति के उत्थान एवं स्त्री-शिक्षा के लिए उदात्त दृष्टिकोण रहा।स्त्री -शक्ति का सम्मान केवल प्रवचन लेखन तक ही सीमित न
था,अपितु गौरव गरिमा हेतु सक्रिय रचनात्मक क़दम भी उठाए ।गुरूदेव ने वह कार्य किया,जो पिछले २५ शताब्दियों में नहीं हुआ ।इतिहास का नया अध्याय ही है कि साध्वी चन्दनाश्रीजी का उनकी ज्ञान,कर्म एवं करूणा की तेजस्वी सृजनशील शक्ति
एवं जनमंगल के कार्यों का सम्मान करते हुए,आचार्य पद पर अभिषिक्त किया ।आचार्य श्री चन्दनाश्रीजी के क्रान्तिकारी विचारों
एवं कर्मक्षेत्र “वीरायतन” के लिए उन्होंने मुक्तमन से आशीर्वाद बरसाये और स्वयं बर्ष १९७४ में क्षेत्रीय सुविधाओं को छोड़कर
राजगृही आए। महावीर एवं बुद्ध की तीर्थ भूमि राजगृही का यह वैभारगिरि पर्वत,सप्तपर्णी गुफ़ा पूज्य गुरूदेव के १९ वर्ष के ज्ञान
तप- साधना से तपोपूत पावन है।यहाँ का कण कण आपके जीवन का संगान कर रहा है। प्रणम्य चरणों में प्रणाम करते हुए जून
१९९१ के सू्र्यास्त के समय गुरू की उस प्रकाशपू्र्ण देह- ज्योति को अपने में समा लिया है और आज वे सब हमें पूज्य गुरूदेव
की विश्वशान्ति हेतु आशीर्वाद बरसाती ज्ञान-रश्मियों को प्रसारित करती मुद्राओं में तरंगायित होते हुए उनकी अनुभूति कराते हैं।
हम चरण स्पर्श करते हैं और उनके आशीर्वाद के वरदहस्त का दिव्य स्पर्श पाते हैं ।पूज्य गुरूदेव का जीवन साहित्यिक सृजन-
शीलता से तन्मय जीवन रहा है ।वे निष्काम मनस्वी संत,महान चिन्तक और महान साहित्यकार रहे।प्राचीन तीनों धर्म परम्पराओं
के मूल स्रो्त आगम,त्रिपिटक और वेदों से अनुप्राणित हो उन्होने अपनी लेखनी को नई दिशा दी ।पूज्य गुरूदेव राष्टसंत उपाध्याय श्री अमरमुनिजी महाराज जिन्हें पाकर बीसवीं सदी में जैन परम्परा के नवजागरण का नया सोपान धन्य और कृतकृत्य हुआ।अनिर्वचनीय है यह सब! हे प्रणम्य !कोटिश:प्रणाम ! हे वन्दनीय ! अहर्निश वन्दन !
आभार उपाध्याय साध्वी यशा जी ।
आज की दुनिया——-
जब अलविदा हो,हिन्द से इन्साफ जन्नत को गये ,
मखलूक़ की इम्दाद करने,तीन बेटे रह गए !
सबसे बड़े रिसवतअली, मझले शिफारिसखान हैं ,
छोटे खुशामतवेग हैं, जिनकी निराली शान है !
हरबसर की कामयाबी, बस इन्हीं के साथ है। ,
हर मुसीबत दूर रहती, जिनपे इनका हाथ है !
क़त्ल के जु्र्म में भी, रिसवतअली की जीत है ,
सख्त हाकिम मौम हो जाता, उसी की जीत है !
खुशामत गोदी में ले, पुचकार—————-
जी हजूरी सीखले , फिर चाहे जो व्यापार कर !!
आज का मानव———–
मानव का केवल इस संसार में ही नहीं ,बल्कि पूरे ब्रह्माण्ड में सर्वश्रेष्ठ स्थान है ।इसीलिये मानव को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सबसे
अधिक तीव्र बुद्धिशाली जीव माना जाता है ।अत: इसी मानव जीवन को प्राप्त करने के लिए बड़े बड़े देवी देवता लालायित रहते
हैं । इसीलिए एक ग्रीक दार्शनिक विद्वान ने कहा था कि–“मनुष्य एक विवेकशील एवं बुद्धिशाली जानवर है” यानी मानव और
जानवर में केवल विवेक एवं बुद्धि का ही अन्तर है। अत: अगर मानव में विवेक बुद्धि न हो तो वह जानवर के ही दर्जे में ही गिना
जायेगा ।
आज का मानव अपनी प्रखर बुद्धि के बल से प्रकृति के प्रकोपों की आहट पहचानने में सक्षम हो गया हैं।मानव ने इस संसार की
सभी भौतिक सुख सुविधाओं को प्राप्त कर लिया है । आज वह अपनी प्रखर बु््द्धि के बल पर आसमान में पक्षियों के समान
उड़ने का आनन्द ले रहा है एवं मछलियों की तरह समुद्र के अथाह जल में तेर रहा है।यह मानव इतना ही नहीं ,बल्कि आसमान
को स्पर्श करने एवं चाँद,सितारों पर अपना आशियाना बनाने का प्रयास कर रहा है।इस चित्र में वैज्ञानिक मानव चन्द्रमा पर
लगभग ३४ किलोमीटर की यात्रा करके,सन्तरे के रंग की मिट्टी का नमूना ले रहा है। धन्य है मानव आज तूने उन्नति के शिखर
की चरम सीमा प्राप्त कर ली है ।
आज का मानव बौद्धिक शक्ति की उन्नति के साथ साथ अपनी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को भूलता जा रहा है ।
इसीलिये प्रतिदिन मानवता का ह्रास होता जा रहा है ।सहानुभूति एवं परोपकारिता की भावना उसके ह्रदय से इस प्रकार
अद्रशय हो रही है,जिस प्रकार कि समुद्र की लहरें तट को स्पर्श कर जल के भीतर अद्रशय हो जाती हैं ।
आज का मानव अपना भौतिक एवं सांसारिक अस्तित्व क़ायम करने के लिये,दूसरे मानव के रक्त को चूसने में ज़रा भी नहीं
हिचकता ।इसीलिये निम्नलिखित कथन सत्य प्रतीत होता है कि:-
“सोने के यह महल खड़े हैं,मिट्टी का ही सीना चीर “
अत: संसार में चारों ओर अराजकता एवं निराशा का वातावरण छाता जा रहा है ।इसी अराजकता एवं निराशा के वातावरण को
समाप्त करने के लिये,हमारी इस भारत भूमि या संसार में कोई न कोई महा मानव अवतार के रूप में पैदा होते रहे हैं ।आज से
२६१२ वर्ष पूर्व घोर मानवता के ह्रास के समय भारत की इसी पवित्र भूमि पर अहिंसा एवं करूणा के अवतार भगवान महावीर एवं गौतम स्वामी जी ने अवतार लिया एवं मानवता के पतन को बचाया था ।
किन्तु आज का मानव फिर पतनोन्मुख हो रहा है और इसी पतन को रोकने के लिये आज के इस युग में महात्मा गांधी जैसी
विभूति ने अपने प्राणों तक की आहुति दे दी थी ,फिर भी मानव अपने मानवीय मूल्यों को प्राप्त करने में सफल नहीं हो पा रहा है। इसीलिये सर्वपल्ली राधाकृष्णन का निम्न कथन सत्य प्रतीत हो रहा है कि:- ” आज का मानव आकाश में चिड़ियों की तरह
उड़ सकता है,पानी के अन्दर प्रवेश कर मछलियों की तरह तैर सकता है,किन्तु दुख है कि आज का मानव ज़मीन पर चलना
भूलता जारहा है ।






