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मेरा शहर मेरा गीत:——

ढा रहा है क़हर मेरा शहर,टूट कर बिखर गई इसकी शान।

बड़ी बड़ी मिलों के भोपुओ से दिन रात का होता था ज्ञान।
ढा रहा है क़हर मेरा शहर,यहीं से भारत की स्वतन्त्रता का गूंजा बिगुल से गीत।
बड़ा रहे थे यहाँ की शान,जिन्होंने न तोड़ी अपनी आन।
जिनका नाम याद करके, आँखें होती हैं नम सीना जाता है तन।
ढा रहा है क़हर मेरा शहर,टूटी हैं सड़के आदमी आदमी को कोस रहा लड़ झगड़ के,
रोज़ नई बातें नई खुरा पाते,सोने नहीं देती दर्द भरी राते,ढा रहा है क़हर मेरा शहर।

             लेखिका:—श्री मती सुमन जैन

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जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों के जन्म स्थानों का विवरण:——-

अयोध्या नगरी:— पाँच –  ( ५ ) जैन तीर्थंकरों का जन्म स्थान है:—-

—————-(१)श्री रिश्भदेव ( श्री आदि नाथ ) जी भगवान   ( २ ) श्री अजितनाथ जी भगवान  (४ ) श्री अभिनन्दन जी भगवान
                     ( ५ ) श्री सुमितनाथ जी भगवान।    ( १४ ) श्री अनन्तनाथजी भगवान
 वाराणसी नगरी:—-चार –(४) जैन तीर्थंकरों का जन्म स्थान है:—-
                      ( ७ ) श्री सुपाशर्वनाथ जी भगवान  ( ८ ) श्री चन्द्रप्रभु जी भगवान ( वारांणसी नगरी से ११ कि.दूरी पर चन्द्रपुरी )
                       सारनाथ से २कि.की दूरी पर)।  ( ११ )  श्री श्रयान्सनाथ जी भगवान।  ( २३ ) श्री पार्श्वनाथ जी भगवान
हस्तिनापुर नगरी:–तीन– (३) जैन तीर्थंकरों का जन्म स्थान हैं:—
                      (१६) श्री शान्तिनाथ जी भगवान।  (१७) श्री कुन्थुनाथ जी भगवान (१८) श्री अरिनाथ जी भगवान
कम्पिल (फरखाबाद):—- जैन तीर्थंकर का जन्म स्थान है:—
                      (१३) श्री विमलनाथ जी भगवान
कौशाम्बी नगर —- ( जनपद के करारी परगना,मुख्यालय मंझनपुर यु.पी. में स्थित है- इलाहाबाद जनपद के दक्षिण-पश्चिम से ६३कि.)
                     ( ६ )वें तीर्थंकर श्री पद्मप्रभु जी का जन्म स्थान है । 
 श्रावस्ती नगर — ( जनपद-बहराइच- उत्तर प्रदेश )
                    ( ३ ) वें तीर्थंकर श्री सम्भवनाथ जी का जन्म स्थान है ।
शौरीपुर नगर ( बाह-तहसील ज़िला – आगरा )
                   ( २२ ) वें तीर्थंकर श्री नेमिनाथ जी का जन्म स्थान है ।
राजगृह नगर —( बिहार प्रान्त )
                 ( २० ) वें तीर्थंकर श्री मुनिसुब्रतनाथ जी का जन्म स्थान है ।
कुन्डलपुर नगर —- ( ज़िला वैशाली- बिहार प्रान्त ) 
                  ( २४ )  वें तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी जी का जन्म स्थान है ।
काकन्दी नगर—
                 (९) वें तीर्थंकर भगवान सुविधिनाथ जी या ( पुष्पदन्त जी)
भदि्दलपुर नगर —-
                (१०)वें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ जी ।
चम्पा नगरी—-
               (१२)वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य जी ।
रत्नपुर नगरी—–
              (१५)वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी ।
मिथिला नगरी—–
             (१९) वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी ।
             (२१)वें तीर्थंकर भगवान नमिनाथ जी ।
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मंगल- धुन———-

             सबसे बढ़कर है नवकार करता है भवसागर पार ।

              चैदह पूर्व का यह सार, बारम्बार जपो नवकार  ।।
              ऋषभ जय, प्रभु पारस जय जय  ।
              महावीर जय, गुरू गौतम जय जय ।।
              महावीर को भज ले मनवा, गौतम को भज ले ।
              शान्ति करगें , शान्तिनाथ  को भज  ले। ।।
              देव हमारे श्री  अरिहन्त, गुरू  हमारे सदगुणी संत ।
              धर्म हमारा दया – प्रधान , शास्त्र  हमारे ज्ञान निधान ।
               श्रमण भगवन्त श्रीमहावीर , त्रिशलानन्दन हरियों पीर ।। 
 
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जैन तीर्थ काशी वाराणसी की यात्रा :— तारीख ५/६ अगस्त २०१७ को बेटी आरती गुप्ता(डौली) के साथ कार द्वारा इलाहाबाद से वावतपुर हवाई अड्डा वाराणसी होते हुये बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के गेस्टहाउस —————————रात्रि ८ बजे पँहुचे और रात्रि वहीं विश्राम किया।यह विश्वविद्यालय भारत ही नहीं बल्कि संसार के विख्यात विश्वविद्यालय की श्रेणी में है।यह करीवन ११ किलोमीटर के विशाल दायरे में फैला हुआ है । हआ ह

ासबसे पहले प्रात: गेस्ट हाउस में सब क्रियायों से निवर्त होकर विशाल क्षेत्र में फैले हुये इस विश्वविद्यालय का कार द्वारा क्रमबध  घूमना शुरू किया।एक साइड में अनेकों विद्यार्थियों के लिये रहने के लिये बहुत सारे होस्टल बने हुये हैं।दूसरी साईट में अनेकों विभिन्न विषयों की पढ़ाई के लिये अनेकों फ़ैकल्टीज के विशाल भवन बने हुये हैं।इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के गैम्स के लिये अनेकों फ़ील्ड एवं दर्शकों के लिये साथ में दर्शक दीर्घाये बनी हुई हैं।कुछ लेनों में पढ़ाने बाले प्रोफ़ेसरों के लिये निवास स्थान बने हुये हैं।कैम्पस में चारों ओर बड़े बड़ें  वृक्ष एवं पार्कों के हरियाली के दर्शन होते हैं।अनेकों स्पोर्ट्स ऐकेडमी एवं एन. एन. सी. आदि के विभाग देखने को मिले।इस सुन्दर वि्श्वविध्यालय की वातावरण मनमोहक एवं विद्या अध्ययन के लिये प्रोत्साहित करता है।अत: एक घंटा कार द्वारा बी.एच.यू. कैम्पस घूमने के पश्चात गेस्ट हाऊस बापिस आकर नास्ता करके,पुन: दूसरे विख्यात पार्श्वनाथ विद्यापीठ आई.टी.आई.रोड करौंदी,वाराणसी पहुँचे।यह स्थान कैम्पस से लगा हुआ कुछ ही दूरी पर है।यह विद्यापीठ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त है।यहाँ पहुँच कर मुझे एक अद्भुत ६६ वर्ष पूर्व स्मृति के आनन्द का आभास होने लगा।यहाँ के प्रबन्धक श्री शुक्ला जी से भेंट करके इस अनूठे जैन दर्शन के शोध करने के विषय पठन पाठन एवं जैनधर्म व जैनदर्शन से सम्बन्धित 

विशाल पुस्तकालय के बारे में जानकारी प्राप्त की।इसके अतिरिक्त उन्होंने मुझे बताया कि अनेकों जैन साधू श्रावक यहाँ जैन धर्म के शोध विषय सम्बन्ध में विशाल पुस्तकालय का इस्तेमाल करते हैं।मेने भी उनको अपना ६६ वर्ष पूर्व का अनुभव का वर्णन बताते हुये कहा कि में अपने सहधर्मी दोस्त भाई श्री स्वर्गीय ओमप्रकाश एवं चन्द्रभान जैन के साथ इसी स्थान पर सन १९५० में आया था।उस समय इसी स्थान पर आगरा से पैदल यात्रा करते हुये गुजरात के महान जैन सन्त स्व. श्रध्देय जगजीवन राम जी एवं उनके पुत्र शिष्य श्रध्देय जयन्ती मुनि जी महाराज पधारे हुये थे।

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Adventureous Journey of East Cost of America USA:———-

             In this adventurous journey of East Cost America USA from California with our daughter and her family,we travelled by Taxi from her house in Cupertino city to the Air Port of San Francisco  on 3rd

July 2011,to catch the Flight of Washington DC the Capital of America USA..It is 3902 km. From SFO
Air Port and 5 hrs journey by Air Flight.
               Now we had reached at Washington DC’s Air Port named “Dulles International Air Port”.It is about 26 miles (42km.) West of Washington DC.We had a booking of room in the one of the best hotel
In the city,than we reached the Hotel and stayed there two days.On this day there was a great Day of 
4rth July i.e. Independence Day of America ,due this there was so many Celeberations ,Lighting on Memorials and Fireworks were performed with great enthusiasm in whole of the city .Washington DC
is a spectacular place to celeberation the Independence Day.The National Mall with Washington DC’s
monuments and the US Capitol in the background forms a beautiful and patriotic backdrop to America ‘s Fireworks.
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Our old memories of adventurous Trip of NIAGARA FALLS USA with my daughter’s family on 8th July 2011.

        Niagara Falls is located in a city in Niagara County,New York,United States.It is 409 miles from New York city and 6 hour 22min away from the New York.Niagara Falls USA consists of two waterfalls on the Niagara River,which marks the border between New York and Canada: the American Falls,located on the American side of the border and

Canadian Horseshoe Falls located on the Canadian side.To the right of the American Falls is a smaller
water fall that has been separated from the American Falls by the natural forces,which is called Bridal
Vell Falls.The water that runs over the Falls comes from the Great Lakes .Ninty percent of the water goes over the Horseshoe Falls.Originally as much as 5.5 billion gallons of water per hour flowed over
the Falls.Today the amount is controlled by the Canadian and American governments to slow erosion.
In addition some of the water is diverted to provide power for thr United States and Canada,making
Niagara Falls the largest source of electric power in the World.
         The river below Niagara Falls 170 feet high.The brink of the Falls is approximately 2500 feet from
from one side to the other.The American Falls are 180 feet high and 1100 feet long.The river below Niagara Falls average 170 feet deep.Daredevils who go over the Falls usually hit the bottom of the river before propping back to the surface.American Falls light up in multi-colors every evening.The estimated water flow over the US side of Niagara Falls is 75000 gallons per second,which comes just the 10 ०/० of the Niagara Falls total water.Though the height of the American Falls is higher than the Canadian counterpart,no daredevil ever preferred  to go over the American Falls.All the stunts were done at the Canadian Horseshoe Falls which more popular with its immense water flow rate and shape.
          Niagara Falls has been one of the most popular destination  for the honeymooners in the World.
Twelve million tourists from all over the world visit Niagara Falls every summer.         
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An experience of adventurous trip of San Francisco,CA.

             It a romantic journey by Cal Train to the San Francisco, which is the biggest town of northern 
California,with my grandson Vardhan.

    
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१- अनित्य भावना:—- नश्वरता का बोध—–

                 हे आत्मन्  ! विचार कर जिस प्रकार खिला हुआ फूल मुर्झा जाता है,अन्जिल का जल बूँद-बूँद टपककर समाप्त हो

जाता है। संध्या की लाली अन्धेरे में बदल जाती है।इसी प्रकार यह बचपन,यौवन,शरीर की सुन्दरता,सत्ता  ओर संपत्ति आदि सब कुछ अस्थिर एवं नाशवान है।तू इनसे ममत्व हटा,अविनासी आत्मा का ध्यान कर।
 
               दोहा:— राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार ।
                           मरना सबको एक दिन,अपनी अपनी बार ।।
२. अशरण भावना :—— 
                  हे आत्मन् ! विचार कर,जब काल रूपी बाज़ झपटता है,तो जीव रूपी कबूतर को दबोचकर ले जाता है। उस समय
ये भवन,धन,संपत्ति,परिवार,सैनिक,सेवक,वैद्ध आदि कोई भी रक्षा नहीं कर सकते।सभी असहाय देखते रह जाते हैं।देख मृत्यु रूपी
सिंह जीव रूपी हिरण को पकड़कर ले जा रहा है।
             दोहा:— दल बल देवी देवता,मात-पिता परिवार ।
                         मरती बिरिया जीव को,कोई न राखनहार ।।
                   अशरण भावना भाने से जीवन,धन एवं परिजन आदि की असारता का बोध होता है।
३. संसार भावना:—संसार एक प्रकार की नाट्यशाला है।इसके रंगमंच पर प्राणी विभिन्न पात्रों के साथ पिता-पुत्र,पति-पत्नी,भाई-भाई आदि के सम्बन्ध बनाता है,किसी से मेत्री करता है,किसी से दुश्मनी करता है।इस प्रकार तरह-तरह के सम्बन्ध जोड़ता है और
कुछ समय बाद सब अलग-अलग बिछुड़ जाते हैं। 
               दोहा:— दाम बिना निर्धन दुखी,तृष्णावश धनवान ।
                           कहुँ न सुख संसार में,सब जग देख्यो छान ।।
४. एकत्व भावना:– एकांगीपन का बोध— चोरी करने वाला चोर,पकड़े जाने पर अकेला ही मार खाता है।यातना भोगता है।पत्नी,पुत्र,पिता कोई भी उसकी यातना नहीं बँटा सकते।संसार में प्राणी अकेला आता है और अकेला ही जाता है।धन, वैभव,पुत्र,
पत्नी आदि कोई भी उसके साथ नहीं जाते।वह नर्क आदि दुर्गतियों में एकाकी ही अपने किये दुष्कर्मों का फल भोगता है।जिस सोने में मिट्टी होती है,उसे ही अग्नि में बार-बार तपना पड़ता है। उसी प्रकार जो आत्मा पर- भाव में अधिक रचा- पचा रहता है।लोभ आदि
में जो अधिक लिप्त है,उसे उतनी ही अधिक चिन्ता,भय,शोक व कष्ट उठाना पड़ता है।कर्ममल मुक्त आत्मा शुद्ध सोने की भाँति
प्रभास्वर रहता है ।
                दोहा:— आप अकेला अवतरे,मरे अकेला होय ।
                            यों कबहुँ या जीव को,साथी सगो न कोय ।।
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अहिंसा : विश्व शान्ति की आधारशिला—————–

             भगवान महावीर का अहिंसा धर्म एक उच्च कोटि का आध्यात्मिक एवं सामाजिक धर्म है। यह मानव जीवन को अन्दर

और बाहर – दोनो ओर से प्रकाशमान करता है। भगवान महावीर ने अहिंसा को भगवती कहा है।मानव विश्व के अन्य प्राणियों को
भी अपने समान ही समझे,उनके प्रति बिना किसी भेदभाव के मित्रता एवं बन्धुता का प्रेमपूर्ण व्यवहार करे। मानव को जैसे अपना
अस्तित्व  एवं सुख प्रिय है,वैसे ही अन्य प्राणियों को भी अपना अस्तित्व तथा सुख प्रिय है । अहिंसा ‘स्व’ और ‘पर’ की,अपने और
पराये की, घृणा एवं वैर के आधार पर खड़ी की गई भेद रेखा को तोड़ देती है ।
               अहिंसा समग्र जीवन में एकता देखती है,सब प्राणियों में समानता पाती है।इसी दृष्टि को स्पष्ट करते हुए भगवान महावीर ने कहा था – ‘एगे आया’ – आत्मा एक है, एक रूप है,एक समान है। चैतन्य के जाति,कुल,समाज,राष्ट्र,स्त्री ,पुरूष आदि के रूप में जितने भी भेद हैं,वे सब आरोपित भेद हैं।बाह्य निमित्तों  के द्वारा परिकल्पित किए गए मिथ्या भेद हैं।आत्माओं के अपने मूल स्वरूप में कोई भेद नहीं है।अहिंसा विश्वास की जननी है और विश्वास परिवार,समाज और राष्ट्र के पारस्परिक सद्भाव ,स्नेह और सहयोग का मूलाधार है।अहिंसा का उपदेश है,सन्देश,आदेश है कि व्यक्तिगतअच्झाई,प्रेम और त्याग से- आपसी सद्भावनापूर्ण पावन परामर्श से केवल साधारणस्तर की सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं को ही नहीं,जाति,सम्प्रदाय ,संस्कृति और राष्ट्रों की विषम से विषम उलझनों को भी सुलझाया जा सकता है।यही वह एक पथ है,जिस पर चलकर मानव मानव को मानव समझ सकता है,उसे प्रेम की बाँहों में भर सकता है।इसी से विश्वबन्धुत्व एवं विश्वशान्ति का स्वप्न पूर्ण हो सकता है
                             राष्ट्रसन्त उपाध्याय अमर मुनि जी के द्वारा प्रवचनों के संग्रह—–अहिंसा- दर्शन के झरोखे से———-
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आत्म-कल्याण कैसे हो:——

           जैन धर्म दृढ़तापूर्वक कहता है कि मैल आत्मा पर लगा हुआ होता है।अत:दुनियाभर के तीर्थों में क्यों भटका जाय? सबसे बड़ा तीर्थ तो अपनी आत्मा ही होती है। क्योंकि उसी में अहिंसा और प्रेम की निर्मल धाराएँ बहती हैं।उसी में पूर्ण डुबकी लगा लेने से

पूर्ण शुद्धता प्राप्त होती है।जैन दर्शन बड़ा आध्यात्मिक दर्शन है,और वह इतना ऊँचा भी है कि मनुष्य को मनुष्यत्व के अन्दर बन्द करता है।मनुष्य की द्रष्टि मनुष्य में डालता है।अपनी महानता अपने ही अन्दर तालाशकरने को कहता है।व्यक्ति अपना कल्याण करना चाहता है,किन्तु प्रश्न उठता है कि कल्याण करे भी तो कहाँ करे?यहाँ पर जैन धर्म स्पष्टत: कहता है कि–जहाँ तुम हो,वहीं पर,बाहर किसी गंगा या और किसी नदी या पहाड़ में नहीं ।आत्म कल्याण के लिए,जीवन-शुद्धि के लिए या अन्दर सोए हुए भगवान
को जगाने के लिए एक इंच भी इधर- उधर जाने की ज़रूरत नहीं है।तू जहाँ है,वहीं जाग जा और आत्मा का कल्याण कर ले।
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