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जैन मुनि पूज्य श्री मानतुंग (भक्त्तामर स्तोत्र के रचियता) का जीवन परिचय

मानतुंग आचार्य इसवी सन सातवी शताब्दी के जैन मुनी थे। जो भक्तामर स्तोत्रके निर्माता है। जिनके समय भोपाल नगरी पर राजा भोज राज्य करते थे। एक बार राजा भोज को मानतुंग आचार्य अपने राज्य मे आने कि खबर मिली तो उन्होने आचार्यजी को भोजन के लिये महल मे आने को आमंत्रण दिया। वो अपना राजपाठ आचार्यजी को दिखाना चाहते थे। ये बात आचार्यजी के ध्यान मे आ गई। उन्होने आने से मना कर दिया। इस बात से राजा भोज क्रोधीत हो गए उन्होने आदेश दिया कि आचार्यजी को बंदी बना लिया जाए। सैनिको ने आचार्यजी को बंदी बना लिया। फिर राजा भोज उनसे मिलने गए। उन्होने आचार्यजी से कहा कि आपको किस बात का अहंकार है। मैं आपका अहंकार तोडता हूं ऐसा कहकर उसने सैनिको को आदेश दिया कि, आचार्यजी को ४८ अंधेरे कमरो मे बंद किया जाये। आचार्यजी मुस्कुराये और राजा को कुछ नही कहा। उनको एक के अंदर एक ४८ कमरो मे बंद कीया गया। और हर कमरे को ताला लागाया गया। और सबसे अंदर के कमरे मे आचार्यजी को लोहे की जंजीर से बांधा गया। 

आचार्यजीने वहा पर भक्तामर स्तोत्र लिखना शुरु किया। तो एक के बाद एक ताले खुलने लगे। आचार्यजीने भक्तामर स्तोत्र मे पुरी ४८ कडीयां लिखी जिसमे उन्होने भगवान आदिनाथ कि स्तुती लिखी। इससे ना सिर्फ आचार्यजी को बंद किये हुए कमरो के ताले खुले बल्कि राजा भोज का सिंघासन भी हडकंप मचाने लगा। ये देख राजा डर गया उसकी समझ मे आ गया कि ये सब उसकी गलति का नतिजा है। उसने तुरंत ही आचार्यजी से माफी मांगी और सम्मान पूर्वक उनको भोजन कराया। कहते है कि जो भी भक्तामर स्तोत्र को भक्ती भावसे पढता है उसके सारे पापोंका नाश होता है।

Namos

बादमे आचार्य मानतूंग महाराष्ट्रमे धुले शहर से १०० किलो मीटर के अंतर पर एक शिखर कि PS I’m om I’m I’llचोटी पर जाकर सदा के लिये ध्यानस्त हो गए। और वही पर उनको मोक्ष कि प्राप्ती हुई। आज उस शिखर को मांगीतुंगी के नाम से जाना जाता है।

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प्रिय बेटी आरती गुप्ता एवं जस्टिस शशीकान्त गुप्ता जी के इलाहाबाद में तारीख़ १०/१२/२०२० को नव निर्मित गृह-प्रवेश एवं पूजा के शुभ अवसर की फ़ोटोज का दिगदर्शन ।

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Poem On Beti—-

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My wife’s 80th birthday in Lucknow @ Hotel Renaissance

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63rd Wedding Anniversary celebrated in 2020

Sharing a picture of the celebrations

Cutting home baked Custard Cake
Exchanging Garland
Missing a few special people
With my eldest daughter

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ऊँकार उपासना:——-

“ ऊँ “ पंच परमेष्टी का वाचक है।अरिहंत ,सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और मुनि- ये पाँच परम इष्ट हैं।अ=अरिहंत , अ=अशरीरी। (सिद्ध ) आा=आचार्य, उ=उपाध्याय, म=मुनि । इस प्रकार पाँचों के आदि अक्षरों को मिलाने से ‘ ऊँकार ‘ की रचना हुई ।ऊँकार के जप से मानसिक निर्मलता तथा नाड़ी संस्थान का सोधन होता है।

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AT A GLANCE —JAIN TEMPLE– AT MILPITAS ,CALIFORNIA, USA.

IJ      This Jain Temple is a proud mixture of harmony and unity,as in Jain Bhawan had combined all Jain traditions–Shwetamber subdivisions,Digamber teachings under one roof.

It is a nice to see a 2400 sq.ft. of the space being used in many different ways.More than 5000(Five thosand) people attend the major religious functions every year.Industrial grade kitchen and dining Hall are fully utilized .Hundred of Jain volunteers work from early morning till late evening to make each function successful.Sunday morning (due to holiday )are filled with lively more than 500 young children following religious classes.The JCNC (Jain Centre of Northern California ) holds regular meditation classes and senior citizens also hold religious discussions on various subjects. This Jain Bhawan is a very popular place for social events in San Francisco Bay Area.
             In this Jain Temple,the marble statues of all Jain Tirthankers are very beautiful and the architecture of the place is superb.This Temple is laid out as follows–Downstairs – A Satsang- Community room with adjoining kitchen -A library- Shower room- Shoe room( with separate rooms for men and women-and also bathrooms. As we enter from the main gate of the temple ,there is a white marble statue of Samavsharan of Bhagwan Mahavir swami ji.
              This Jain Temple is only 18 miles from my daughter Gauri’s house.In the year 2015 I had the privilege to witness all the religious ceremonies at Jain temple in Milpatas with my wife.In my previous 5 visits of California ,we had also the privilege to participate in all the religious ceremonies of the Jain temple of the year 2015.We had attended the Paryushan Maha Parv ceremonies,which Started on Thursday 10th sep. to 19th sep.2015.We also attended many days of pravachan on Kalpsutra by Paras Bhai Shah.On Sunday 13th September,we attended the Sapna Cerimony which means  that there were 14 Dreams seen by Lord Mahavir’s mother Trisla. At this stage of the temple auditorium the
Womens depicted the 14 Dreams of mother Trisla,while moving in a processation carried the silver symbol of all the 14 Dreams .All the eight days of Paryushan Parv there was a regular Lunch and Dinner (Before Sun Set) arranged by the whole Jain Community. Mostly young members of the community worked vouluntarily and about 2000 to 2500 peoples approx. dine. It was really astonishing to see that even the president along with the other executive members of the Jain community volunteer  to pick the used food plates collected in a small bins and throw it in the bigger one. The seniors are given a lot of importance and they have a separate dining hall,where they can sit and eat comfortably.
 
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मेरे बचपन के संस्मरण की घटना की सत्य कहानी:—-

मेरा बचपन पुलछिंगा मोदी लोहामंडी में व्यतीत हुआ था।इसी स्थान के आसपास ज़्यादातर अग्रवाल लोहिया जैन समाज के लोग रहा करते थे।इसी स्थान पर एक जैन श्वेत्मबर स्थानकवासी स्थानक था।यहाँ सभी जैन समाज के लोग इकट्ठा होकर उपासना करतेथे।इसी जैन समाज के अच्छे परिवार का एक व्यक्ति श्री घनश्याम दास जैन के नाम आया और इसी समाज एवं परिवार के इस व्यक्ति को कम समझ होने की वजह से परिवार एवं समाज से तिृष्कृति होने की वजह से,इसी मोहल्ले के बच्चे चिडाते और परेशानकरते थे।इह दिमाग़ से भी बहुत कमज़ोर चिड़चिड़ा रहता था।और कुछ पागलपन की भी हरकतें करता और कभी श्मशान स्थान परजाकर सो जाया करता था।जिसकी वजह से मोहल्ले के बच्चे उसको घासीराम भूत के नाम से भी सम्बोधित करते थे।वह अपने कोकृष्ण भगवान का अवतार कहता था और बच्चों को कृष्ण की लीलाओं का नाटक करके नाचता गाता रहता था।कभी कभी वह अपने सहारे के डन्डे को बाँसुरी का रूप बना अपने होटो के पास लगा कर कृष्ण की लीला का नाटक करने लगता था।मौहल्ले के बच्चे उसको चिडाते और उसके ऊपर पत्थर के छोटे छोटे टुकड़े फेंकते ,उस समय वह अपना रौद्र रूप धारण करता और सबको गालियाँ बकता और कहता तुम सब रावण की सन्तान हो और तुम्हारी लंका में आग लग जावे और तुम जल कर भष्म हो जाओ।इस प्रकार बच्चों को गाली बकता हुआ,तुम रावण की औलाद हो,कहता हुआ दौड़ाता था।इसी तरह की हरकतें करता हुआ वहअपना जीवन निर्वाह कर रहा था।जीवन की ठोकरों से उकताये हुये राही की तरह,अपने लड़खड़ाते हुये क़दमों से,अपने जीवन कीअंतिम मन्जिल को लकड़ी के डन्डे के सहारे तय कर रहा था।मृत्यु भी उसके जीवन की दुर्दशा पर अट्टहास कर रही थी।काल भीउसके कंकाल को हड़पने के लिये तैयार बैठा था।समाज और संसार की निगाहों में वह पागल,लाचार दिखाई पड़ता था।किन्तुसत्यता तो यह है,कि लोहामंडी के बच्चों एवं समाज के ही कुछ लोगों ने,अपने हास्य परिहास्य का आनन्द लेने के लिये उसकोपागल,लाचार एवं भूत का रूप दिया हुआ था।

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अनमोल है जल:—हम भोजन करें

और अगर हमें पीने के लिए पानी न मिले तो क्या स्थिति होगी हमारी?क्या हम एक दिन भी पानी के बिना रह सकेंगे ?अत: पानी को व्यर्थ बर्बाद न होने दे।हमारी पृथ्वी ७५% जलमग्न है लेकिन मात्र एक प्रतिशत पानी ही मानव के लिए उपयोगी है।

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उवसग्गहरं स्तोत्र

उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्म-घण-मुक्कं ।
विसहर विसनिन्नासं, मंगल-कल्लाण-।आवासं ।१।
विसहर फुलिंगमंतं, कण्ठे धारेई जो सया मणुओ ।
तस्स गह-रोग-मारी दुट्ठ-जरा जंति उवसामं ।२।
चिट्ठउ दूरे मंतो, तुझ पणामो वि बहुफलो होइ ।
नर-तिरिएसु वि जीवा, पावंति न दुक्ख-दोहग्गं ।३।
तुह सम्मत्ते लद्धे चिंतामणि-कप्प-पाय वब्भहिए ।पावंत्ति अविग्घेणं जीवा अयरामरं ठाणं। ।४।इह संथुओ महायस ! भत्तिब्भर- निब्भरेण हियएण ।ता देव ! दिज्ज बोहिं भवे – भवे पास जिणचंद ।५
[ हिन्दी अनुवाद ]
उपसर्गों को दूर करने वाले कर्म रूपी आवरणों से मुक्त विषों (विकारों) का नाश करने वाले मंगल-कल्याण के केन्द्र
पाशर्वनाथ भगवान की वन्दना करता हूँ ।।१।।
जो मानव, अष्टादश अक्षरों वाले विषहर मंत्र का सदा स्मरण करा है उसके ग्रह- रोग – मारी, दुष्टजन- ज़रा आदि उपशान्त रहते हैं ।।२ ।।मंत्र तो दूर रहो, आपको प्रणाम करने का ही महाफल है। नरक तिर्यंचगति में ही जीव दु:ख नहीं पाता ।।३।।आपके दर्शन और श्रद्धा की प्राप्ति चिंतामणि रत्न और कल्पवृक्ष आदि से भी अधिक महत्वपूर्ण है , जिसके प्रवाह से जीव शीध्रही अजरामर स्थान को प्राप्त करता है ।।४ ।। हे महायश पाशर्व जिनचन्द्र ! भक्ति रस से लबालब भरे हृदय से में आपकी स्तुति करता हूँ । भव- भव में मुझे सदबोधिकी प्राप्ति हो।। ५ ।।

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