
पू. भगवान महावीर जैन धर्म के चौंबीसवें (२४वें) तीर्थंकर है। भगवान महावीर का जन्म करीब ढाई हजार साल पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व), वैशाली के गणतंत्र राज्य क्षत्रिय कुण्डलपुर में हुआ था। तीस वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्मकल्याण के पथ पर निकल गये।
जन्म
भगवन महावीर का जन्म ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली गणतंत्र के कुण्डलपुर में इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहाँ चैत्र शुक्ल तेरस को हुआ था। ग्रंथों के अनुसार उनके जन्म के बाद राज्य में उन्नति होने से उनका नाम वर्धमान रखा गया था। जैन ग्रंथ उत्तरपुराण में वर्धमान, वीर, अतिवीर, महावीर और सन्मति ऐसे पांच नामों का उल्लेख है।[3] इन सब नामों के साथ कोई कथा जुडी है। जैन ग्रंथों के अनुसार, २३वें तीर्थंकर पार्श्वनाथजी के निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त करने के 188 वर्ष बाद इनका जन्म हुआ था।[4]
विवाह
दिगम्बर परम्परा के अनुसार महावीर बाल ब्रह्मचारी थे। भगवान महावीर शादी नहीं करना चाहते थे क्योंकि ब्रह्मचर्य उनका प्रिय विषय था। भोगों में उनकी रूचि नहीं थी। परन्तु इनके माता-पिता शादी करवाना चाहते थे। दिगम्बर परम्परा के अनुसार उन्होंने इसके लिए मना कर दिया था।[5] श्वेतांबर परम्परा के अनुसार इनका विवाह यशोदा नामक सुकन्या के साथ सम्पन्न हुआ था और कालांतर में प्रियदर्शिनी नाम की कन्या उत्पन्न हुई जिसका युवा होने पर राजकुमार जमाली के साथ विवाह हुआ। [note 1]
तपस्या
भगवान महावीर का साधना काल १२ वर्ष का था।[7] दीक्षा लेने के उपरान्त भगवान महावीर ने दिगम्बर साधु की कठिन चर्या को अंगीकार किया और निर्वस्त्र रहे। श्वेतांबर सम्प्रदाय जिसमें साधु श्वेत वस्त्र धारण करते है के अनुसार भी महावीर दीक्षा उपरान्त कुछ समय छोड़कर निर्वस्त्र रहे और उन्होंने केवल ज्ञान की प्राप्ति भी दिगम्बर अवस्था में ही की। अपने पूरे साधना काल के दौरान महावीर ने कठिन तपस्या की और मौन रहे। इन वर्षों में उन पर कई ऊपसर्ग भी हुए जिनका उल्लेख कई प्राचीन जैन ग्रंथों में मिलता है।

केवल ज्ञान और उपदेश
इन्हें भी देखें: जैन धर्म में भगवान
जैन ग्रन्थों के अनुसार केवल ज्ञान प्राप्ति के बाद, भगवान महावीर ने उपदेश दिया। उनके ११ गणधर (मुख्य शिष्य) थे जिनमें प्रथम इंद्रभूति थे।[8]
जैन ग्रन्थ, उत्तरपुराण के अनुसार महावीर स्वामी ने समवसरण में जीव आदि सात तत्त्व, छह द्रव्य, संसार और मोक्ष के कारण तथा उनके फल का नय आदि उपायों से वर्णन किया था।
| महावीर | |
|---|---|
| चौबीसवें तीर्थंकर | |
पहाड़ पर उकेरी गयी तीर्थंकर महावीर की आकृति (तमिल नाडु) | |
| विवरण | |
| अन्य नाम | वीर, अतिवीर, वर्धमान, सन्मति |
| एतिहासिक काल | ५९९-५२७ ई.पू. |
| शिक्षाएं | अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद |
| पूर्व तीर्थंकर | पार्श्वनाथ |
| गृहस्थ जीवन | |
| वंश | इक्ष्वाकु |
| पिता | राजा सिद्धार्थ |
| माता | त्रिशला |
| पंचकल्याणक | |
| जन्म | चैत्र शुक्ल त्रयोदशी |
| जन्म स्थान | कुंडलग्राम, वैशाली के निकट |
| मोक्ष | कार्तिक अमावस्या |
| मोक्ष स्थान | पावापुरी, जिला नालंदा, बिहार |
| लक्षण | |
| रंग | स्वर्ण |
| चिन्ह | सिंह |
| ऊंचाई | ६ फीट (७ हाथ) |
| आयु | ७२ वर्ष |
| शासक देव | |
| यक्ष | मातंग |
| यक्षिणी | सिद्धायिका |
| गणधर | |
| प्रथम गणधर | गौतम गणधर |