मेरा बचपन पुलछिंगा मोदी लोहामंडी में व्यतीत हुआ था।इसी स्थान के आसपास ज़्यादातर अग्रवाल लोहिया जैन समाज के लोग रहा करते थे।इसी स्थान पर एक जैन श्वेत्मबर स्थानकवासी स्थानक था।यहाँ सभी जैन समाज के लोग इकट्ठा होकर उपासना करतेथे।इसी जैन समाज के अच्छे परिवार का एक व्यक्ति श्री घनश्याम दास जैन के नाम आया और इसी समाज एवं परिवार के इस व्यक्ति को कम समझ होने की वजह से परिवार एवं समाज से तिृष्कृति होने की वजह से,इसी मोहल्ले के बच्चे चिडाते और परेशानकरते थे।इह दिमाग़ से भी बहुत कमज़ोर चिड़चिड़ा रहता था।और कुछ पागलपन की भी हरकतें करता और कभी श्मशान स्थान परजाकर सो जाया करता था।जिसकी वजह से मोहल्ले के बच्चे उसको घासीराम भूत के नाम से भी सम्बोधित करते थे।वह अपने कोकृष्ण भगवान का अवतार कहता था और बच्चों को कृष्ण की लीलाओं का नाटक करके नाचता गाता रहता था।कभी कभी वह अपने सहारे के डन्डे को बाँसुरी का रूप बना अपने होटो के पास लगा कर कृष्ण की लीला का नाटक करने लगता था।मौहल्ले के बच्चे उसको चिडाते और उसके ऊपर पत्थर के छोटे छोटे टुकड़े फेंकते ,उस समय वह अपना रौद्र रूप धारण करता और सबको गालियाँ बकता और कहता तुम सब रावण की सन्तान हो और तुम्हारी लंका में आग लग जावे और तुम जल कर भष्म हो जाओ।इस प्रकार बच्चों को गाली बकता हुआ,तुम रावण की औलाद हो,कहता हुआ दौड़ाता था।इसी तरह की हरकतें करता हुआ वहअपना जीवन निर्वाह कर रहा था।जीवन की ठोकरों से उकताये हुये राही की तरह,अपने लड़खड़ाते हुये क़दमों से,अपने जीवन कीअंतिम मन्जिल को लकड़ी के डन्डे के सहारे तय कर रहा था।मृत्यु भी उसके जीवन की दुर्दशा पर अट्टहास कर रही थी।काल भीउसके कंकाल को हड़पने के लिये तैयार बैठा था।समाज और संसार की निगाहों में वह पागल,लाचार दिखाई पड़ता था।किन्तुसत्यता तो यह है,कि लोहामंडी के बच्चों एवं समाज के ही कुछ लोगों ने,अपने हास्य परिहास्य का आनन्द लेने के लिये उसकोपागल,लाचार एवं भूत का रूप दिया हुआ था।
Categories