जैन धर्म दृढ़तापूर्वक कहता है कि मैल आत्मा पर लगा हुआ होता है।अत:दुनियाभर के तीर्थों में क्यों भटका जाय? सबसे बड़ा तीर्थ तो अपनी आत्मा ही होती है। क्योंकि उसी में अहिंसा और प्रेम की निर्मल धाराएँ बहती हैं।उसी में पूर्ण डुबकी लगा लेने से
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आत्म-कल्याण कैसे हो:——
पूर्ण शुद्धता प्राप्त होती है।जैन दर्शन बड़ा आध्यात्मिक दर्शन है,और वह इतना ऊँचा भी है कि मनुष्य को मनुष्यत्व के अन्दर बन्द करता है।मनुष्य की द्रष्टि मनुष्य में डालता है।अपनी महानता अपने ही अन्दर तालाशकरने को कहता है।व्यक्ति अपना कल्याण करना चाहता है,किन्तु प्रश्न उठता है कि कल्याण करे भी तो कहाँ करे?यहाँ पर जैन धर्म स्पष्टत: कहता है कि–जहाँ तुम हो,वहीं पर,बाहर किसी गंगा या और किसी नदी या पहाड़ में नहीं ।आत्म कल्याण के लिए,जीवन-शुद्धि के लिए या अन्दर सोए हुए भगवान
को जगाने के लिए एक इंच भी इधर- उधर जाने की ज़रूरत नहीं है।तू जहाँ है,वहीं जाग जा और आत्मा का कल्याण कर ले।