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मेरा जन्म दिनांक २३-०७-१९३२ को लोहामंडी पुलछिंगा मोदी,नगर आगरा हिन्दी तिथि अनुसार ( रविवार माह फाल्गुन बिक्रम सम्बत १९८९ शाक सम्बत १८५४श्रावण माह कृष्ण पक्ष ६ शनिवार उत्ररा भाद्र पद नक्षत्रे अग्रवाल तायल गोत्रे लेखराज तत्पुत्र बट्टोलाल जी जैन,जन्म नाम देवी प्रसाद स्वामी गुरू राशि मीन )पैदा हुआ था ।
बचपन में मुझे जंगी के नाम से पुकारते थे ।क्योंकि मैं आगरा नगर के सरकारी अस्पताल सरोजिनी नायडू
अस्पताल में पैदा हुआ था।इसके पूर्व मेरी माता जी के दो बच्चे बचपन में मर चुके थे। इसी बजह से मुझे बचपन से बड़े लाड़ प्यार से लालन पालन हुआ ।मेरी माँ एवं दादी मुझसे बहुत लाड़ प्यार करते थे।जब में तीन चार साल का था,उस समय मेरी दादी मुझसे छिपा कर एक व दो की जगह तीन चार पूरियाँ खिली दिया करती थीं और में रोता हुआ कहता था कि मेरा पेट भर गया है में अब नहीं खा पाऊँगा ,वह कहती थीं कि देख मरे अभी तो मेरे हाथ में वही दो पूड़ीयां हैं,इस प्रकार
मुझे चार पूरियाँ खिला दिया करती थीं।उस समय हमारे घर पर एक भोजा महाराज नाम का एक ब्राह्मण सेवक रहता था और सारे घर के कार्य करता था एवं घर के छोटे बच्चों की देख भाल,घुमाना आदि काम करता था।इस भोजा महाराज को मुझसे विशेष प्यार था,अत: मुझे अपने कन्धे पर बैठा कर घुमाने प्रति दिन ले जाया करता था।इस तरह मुझे कन्धे पर बिठा कर घुमाने के लिये मेरे पिता जी मना करते थे ओर कहते थे कि तुम इस बच्चे की आदत मत ख़राब करो।जब में पाँच बर्ष का हुआ तब मुझे मेरे निवास स्थान के बहुत नज़दीक के सरकारी
म्यूनिसिपल स्कूल में मेरा नाम पड़ने के लिये लिखा दिया।वहाँ मेरे मोहल्ले एवं आसपास के बच्चे ही पड़ते थे।प्रारम्भ में मुझे एक लकड़ी की पट्टी एवं मिट्टी का बुदका(दबात) और सरकण्डे की क़लम बना कर दे दी गई।में उस लकड़ी की पट्टी को प्रिति दिन मुलतानी मिट्टी लगाकर एवं कालोंच लगा कर एक चिकने खोंटे से खिस कर चिकना करके,फिर उस पर हिन्दी के अक्षर लिखा करता था।दो बर्ष यहाँ पड़ने के पश्चात मेरा दाख़िला लोहामन्डी के ही श्री रत्न मुनि जैन स्कूल में करा दिया गया।इस समय तक
बचपन में मुझे जंगी के नाम से पुकारते थे ।क्योंकि मैं आगरा नगर के सरकारी अस्पताल सरोजिनी नायडू
अस्पताल में पैदा हुआ था।इसके पूर्व मेरी माता जी के दो बच्चे बचपन में मर चुके थे। इसी बजह से मुझे बचपन से बड़े लाड़ प्यार से लालन पालन हुआ ।मेरी माँ एवं दादी मुझसे बहुत लाड़ प्यार करते थे।जब में तीन चार साल का था,उस समय मेरी दादी मुझसे छिपा कर एक व दो की जगह तीन चार पूरियाँ खिली दिया करती थीं और में रोता हुआ कहता था कि मेरा पेट भर गया है में अब नहीं खा पाऊँगा ,वह कहती थीं कि देख मरे अभी तो मेरे हाथ में वही दो पूड़ीयां हैं,इस प्रकार
मुझे चार पूरियाँ खिला दिया करती थीं।उस समय हमारे घर पर एक भोजा महाराज नाम का एक ब्राह्मण सेवक रहता था और सारे घर के कार्य करता था एवं घर के छोटे बच्चों की देख भाल,घुमाना आदि काम करता था।इस भोजा महाराज को मुझसे विशेष प्यार था,अत: मुझे अपने कन्धे पर बैठा कर घुमाने प्रति दिन ले जाया करता था।इस तरह मुझे कन्धे पर बिठा कर घुमाने के लिये मेरे पिता जी मना करते थे ओर कहते थे कि तुम इस बच्चे की आदत मत ख़राब करो।जब में पाँच बर्ष का हुआ तब मुझे मेरे निवास स्थान के बहुत नज़दीक के सरकारी
म्यूनिसिपल स्कूल में मेरा नाम पड़ने के लिये लिखा दिया।वहाँ मेरे मोहल्ले एवं आसपास के बच्चे ही पड़ते थे।प्रारम्भ में मुझे एक लकड़ी की पट्टी एवं मिट्टी का बुदका(दबात) और सरकण्डे की क़लम बना कर दे दी गई।में उस लकड़ी की पट्टी को प्रिति दिन मुलतानी मिट्टी लगाकर एवं कालोंच लगा कर एक चिकने खोंटे से खिस कर चिकना करके,फिर उस पर हिन्दी के अक्षर लिखा करता था।दो बर्ष यहाँ पड़ने के पश्चात मेरा दाख़िला लोहामन्डी के ही श्री रत्न मुनि जैन स्कूल में करा दिया गया।इस समय तक
मेरे मौहल्ले पुलछिंगामोदी में बिजली की कोई लाईन एवं कोई तार नहीं लगे थे,जिसकी वजह से मौहल्ले में किसी के बिजली नहीं थी,जिसकी वजह से मैं छटवीं क्लास तक मिट्टी के तेल के लैम्प से पड़ता था।मेरे पूरे मौहल्ले में लकड़ी के खम्भे पर मिट्टी के तेल के लैम्प सन्ध्या होते ही म्यूनिसिपल्टी का कर्मचारी चिमनी साफ़ करके जलाने आया करता था और प्रात:काल लैम्प की लाइट बुझाने आया करता था।मेरे घर के पास ही कुम्हारों की बस्ती थी,जो मिट्टी के बर्तन बनाया करते थे।उस ज़माने में मौहल्ले के ग़रीब
एवं अमीर लोग बड़े प्रेम पूर्वक रहा करते थे।मौहल्ले एक दो लोग जो अमीर होते थे वह मुखिया बन कर पूरे सभी लोगों का बड़ा ध्यान और देखभाल रखते थे।सारे मौहल्ले के लोग उस मुखिया की इज़्ज़त करते थे।उस समय मेरे मोहल्ले के मुखिया मेरे ताऊ जी
लाला श्याम लाल जी जैन हुआ करते थे।मेरे घर के बाहर एक बड़ा लम्बा चबूतरा हुआ करता था।वह सुबह एवं सांयकाल चबूतरे पर कमरे से बाहर निकल कर मूढ़े पर बैट कर मौहल्ले के लोगों की फ़रियाद सुना करते थे और उनके आपस के निपटारे कराया करते थे।इसके अतिरिक्त वह अपने लोहामंडी स्थानकवासी जैन समाज मुखियाओं में भी एक साहसिक एक धार्मिक व्यक्तित्व वाले
हुआ करते थे।उस समय मेरे आदरणीय पिता श्री लाला बट्टों लाल जी एवं लाला श्याम लाल जी एक ही मकान के ऊपर की मंज़िल
में मेरे पिता जी और नीचे की मन्जिल में मेरे ताऊ जी रहा करते थे।मेरे पिता जी की भी एक धार्मिक,सज्जन ,निश्चल एवं भद्र पुरुष
थे।मेरी माता जी श्रीमती रत्नदेवी जी भी निश्छल ,कर्तव्यनिष्ट,धर्मपरायण महिला थीं।वह हमेशा मेरे स्वास्थ्य एवं भोजन व्यवस्था का
ध्यान रखती थीं। जैसे जैसे मैं उम्र में बड़ा होता जा रहा था ,उसी प्रकार मेरे खाने में स्वास्थ्यवर्धक भोजन की व्यवस्था करती रहती थीं।मेरा सर्दी,ज़ुकाम का मिज़ाज होने की बजह से स्वय्म प्रति दिन दूध में बदाम। एवं पोसत घिस कर दिया करती थी और मेरे पढ़ाई के दिनों में फलो को काट व छील कर प्लेट में लगा कर दिया करती थीं।यह मेरी माँ की मुझ पर अगाध प्रेम की मिशाल दर्शाती है।
जब मेरा श्री रत्न मुनि जैन स्कूल में तीसरी क्लास में दाख़िला करा दिया,उस समय मेरी क़रीबन ८ बर्ष की थी।यह स्कूलऐम
मेरे निवास स्थान से १/२ आधा किलो मीटर की दूरी पर था।इस स्कूल में उस समय अपने जैन समाज के ही श्री जगन्नाथ प्रसाद जैन हैड मास्टर थे और श्री मोहन लाल जैन भी एक अध्यापक थे।यह जैन धर्म की भी शिक्षा देते थे।इस प्रकार तीन,चार,पाँच एवं
छटी क्लास तक इसी स्कूल में शिक्षा प्राप्त की थी।जब में पाँच क्लास में आया तभी से मुझे,मेरे निवास स्थान के नज़दीक के गवर्मेन्ट हाई स्कूल के रिटायर टीचर श्री सोहन लाल भारद्वाज ( गुरू जी) के यहाँ प्राईवेट ट्यूशन पड़ने के लिये भेजना शुरू करा इस ्ंवयसप्रदिया।वह मुझेअन्य चार बच्चों के साथ शाम को ४से ६ बजे तक पढ़ाना शुरू कर दिया।वेसे तो वह बहुत विद्वान टीचर थे और उनको
अंग्रेज़ी की ग्रामर,अर्थमेटिक एवं ज्योतिष का अच्छा ज्ञान था और उस ज़माने में अंग्रेज़ लेखक रेन की ग्रामर की बहुत प्रचलित था
अत: जब भी ख़ाली समय हुआ करता था तब वह इन तीनों विषयों पर अध्ययन किया करते थे।वह मिठाई खाने के भी बहुत शौक़ीन
थे,इसी लिये बीसियों मिठाई के पढ़ने बाले बच्चों को नाम सुनाया करते थे एवं पढ़ाई कम अन्य क़िस्से कहानियाँ सुनाया करते थे।
उनके बड़े लड़के श्री राम नाथ भारद्वाज ने,पड़ाना बाले कमरे में दीवार पर श्री हनूमान जी का हाथ में गदा लिये हुये एक सुन्दर चित्र
बनाया हुआ था।हम सब बच्चे अपने पडाने बाले टीचर जी को गुरू जी के नाम से पुकारा करते थे।उसी मोहल्ले में एक अगुनउआँ नाम का हलवाई हुआ करता था वह दूध की पेढा,वर्दी बहुत अच्छी क्वालिटी का बनाया करता था,अत: गुरू जी पढ़ने बाले बच्चों से
पेढा,वर्फी मँगाया करते थे।बच्चों को दीवार की तस्वीर की तरफ़ इशारा करते हुये कहते थे कि श्री हनूमान जी का ध्यान करा करो
और ब्रह्मचर्य से रहा करो।इन बच्चों के साथ सोम ठाकुर नाम का बच्चा भी हमारे साथ पढ़ता था,वह आज भारतवर्ष के प्रसिद्ध कवियों में नाम आता हैं।इन अपने टीचर जी को,सभी बच्चे गुरू जी के नाम से पुकारते थे।इन्हीं की बजह से मेरा गवर्मेन्ट हाई स्कूल
में ७वीं क्लास में दाख़िला करा दिया गया था।उस समय इह आगरा के बहुत अच्छे स्कूलों में माना जाता था।१०वीं क्लास तक मेरी
इसी स्कूल में शिक्षा पूर्ण हुई।
बचपन से ही में (८ वीं क्लास ) से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा में जाया करता था।और मेरे परिवार के सभी सदस्य श्री महात्मा गांधी एवं भारतीय कांग्रेस पार्टी के अनन्य भक्त थे।अत: इसी वजह से मेरे पिता जी एवं अन्य बड़े सदस्य खद्दर की धोती कुर्ता एवं जवाहर बास्केट अादि कपड़े पहना करते थे। मेरे ताऊ श्री हज़ारी लाल के बड़े लड़के श्री दरबारी लाल जी ,ऐडवोकेट,
(ऐम.ऐस्सी.,ऐल. ऐल.बी.) यू.पी. की कांग्रेस कमेटी के मेम्बर भी थे।इस प्रकार मेरे परिवार के साथ साथ मेरी लोहामंडी,आगरा शहर की अग्रवाल लोहिया समाज में सभी कांग्रेस पार्टी से घनिष्ट रूप से जुड़े हुये थे।इस प्रकार में ही अकेला अपने परिवार एवं समाज में
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का सदस्य था।जब सन १९४८ ३० जनवरी को नई दिल्ली स्थित बिरला भवन में साँयकाल के समय प्रति दिन के कार्यक्रम के अनुसार जब श्री महात्मा गांधी जी प्राथना कर रहे थे उसी समय किसी सिरफिरा व्यक्ति (नाथूराम गोडसे ) ने उस महान व्यक्तित्व की पिस्टल से गोली मार कर हत्या कर दी।यह एक अविश्वसनीय समाचार सारे भारतवर्ष एवं सारे विश्व में आँधी की तरह फैल गया।समस्त भारतवर्ष के लोग शोक में डूब गये।ऐसा प्रतीत हो रहा था कि भारत का प्रत्येक जनमानस शोकाकुल में डूबा हुआ है।उसी समय शीध्र से शीघ्र भारत सरकार ने सभी हिन्दू बादी संस्थाओं के क्रियाकलापों पर पाबन्दी लगा दी,और विशेष रूप से आर. एस. एस. यानी राष्ट्रों स्वयं सेवक संघ पर पूर्णरूपेण बैन लगा दिया,जिसकी वजह से इस संस्था के सभी स्वयंसेवकों किसी भी प्रकार के कार्यकालापों के लिये बैन लगा दिया।
उस समय भारत सरकार ने सभी हिन्दू संगठनों एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर बैन लगा दिया।जिसकी वजह से राष्ट्रीय स्वयं सेवक
संघ के सभी कार्यकर्ताओं एवं पूरे भारतबर्ष के संघटन ने इसके विरोध में ज़ैल भरो आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया।इस समय में भी इस संस्था का एक कर्मठ सदस्य बन गया था।भारत सरकार ने इस संस्था के बड़े लीडरों को गिरफ़्तार करना भी शुरू कर दिया था।इसी
समय समाज के कुछ व्यक्तियों ने मेरे पिता जी को बताया कि आपके लड़के जगदीश को भी पुलिस पकड़ कर जेल भेज सकती है।इस डर की बजह से मेरे पिता जी ने मुझे गांधी टोपी पहना कर मुझे मेरे परिवार के प्रतिष्ठान शिवपुरी (ग्वालियर) स्टेट में स्थित मुनीम जी के साथ आगरा केन्ट रेलवे स्टेशन ट्रेन के द्वारा भेजने का प्रबन्ध कर दिया था।जब में मुनीम के साथ स्टेशन पहुँचा तो पता
लगा की ट्रेन २ घंटा की देरी से आवेगी।अत: मेने मुनीम जी कहा कि घर बापिस जाकर मेरे लिये खाना लेकर आईयेगा।जेसे ही वह घर के लिये रवाना हुये वेसे ही में भी अपने सामान के साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रधान कार्यालय गोकुलपुरा राजामंडी बापिस आ गया और दूसरे दिन प्रात: काल के पहले आन्दोलन करने बालों स्वयं सेवकों के साथ जयकारे लगाता हुआ आगरा शहर
कोतबली पँहुच गया।वहाँ से सब आन्दोलन करने बालों के साथ ज़ैल भेज दिय गया।मेरे लोहामंडी निवास स्थान के नज़दीक हरीशंकर नाम का एक स्वयं सेवक रहता था,उसके साथ मेने अपनी अटेची हाथ घड़ी आदि सामान अपने निवास स्थान पर भिजवा दिया और सूचित करवा दिया कि में आन्दोलन में आगरा डिस्ट्रिक ज़ैल में बन्द कर दिया गया हूँ।