तू एकाकिनी मैं एकाकी, फिर कैसा शर्माना ।
मेरा तेरा नाता जन्म जन्म का चिर पहचाना ।।
तू तो मुझसे रूठ नहीं ,यह सारी दुनिया रूठी ।
आ मेरे प्राणों की छाया,तुमको आज मनालू । ।
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मेरे सूने अम्बर पर तुम, पावस घन बनकर घिर आओ ।
मुरझाऐ सुख के बादल पर, अमृत के सीकर बरसाओ ।।
तुमको देते हैं आमन्त्रण , मेरे आतुर उर के स्पन्दन ।
बिछड़े मन में,फिर मिलने का विश्वास सिहरता आता है,
तुम आती हो तो जीवन में मधुमास विखरता आता है ।।
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जगदीश प्रसाद जैन