ीी राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार । मरना सबको एक दिन अपनी- अपनी बार ।।
दल बल देवी देवता , मात-पिता परिवार । मरती बिरिया जीव को,कोई न राखनहार ।।
दाम बिना निर्धन दु:खी , तृष्णावश धनवान ।कहुँ न सुख संसार में,सब जग देख्यो छान ।।
आप अकेला अवतरे, मरे अकेला होय ।यों कबहुँ या जीव को,साथी सगो न कोए। ।।
जहाँ देह अपनी नहीं, तहाँ न अपना कोय ।घर सम्पत्ति प्रकट ये,पर हैं परिजन लो़़य ।।
दिपे चाम चादर मढ़ी ,हाड़-पिंजरा देह ।भीतर या सम जगत में,और नहीं घिन-देह ।।
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