उपवास का लक्ष्य प्राय: शरीर संस्थान को विश्राम देना होता है । उपवास गौण रूप में शारीरिक तथा मुख्य रूप में आध्यात्मिक
उद्देश्य से प्रेरित होता है । उपवास दो शब्दों का योगिक रूप है । उप और वास । उप का अर्थ है पास और वास का बैठना या
वास करना । उपवास का अर्थ उस भगवान की निकटता पाना है, जो शक्ति, ज्ञान और आनन्द का अक्षय भण्डार है ।अगर
हम उपवास करने की सही विधि जानकर इसे अपनाएें,तो जिस प्रकार आग के पास बैठने से हम उसके गुण उष्णता का अनुभव
करते हैं,उसी प्रकार भगवान के पास बैठने से हमें उसके गुण शक्ति,ज्ञान,आनन्द की अनुभूति हो सकेगी । परन्तु आम तौर पर
उपवास से भोजन- त्याग मात्र तथा पाचन संस्थान को विश्राम देने का ही अर्थ लिया जाता है ।
यत्र- तत्र ऐसे अनेक उदाहरण पाये जाते हैं कि भोजन जीवनी शक्ति उत्पन्न नहीं करता, वह केवल शरीर निर्माण का तत्व है ।
इस प्रकार भोजन न करने से शरीर का वजन भले ही कम हो जाय, पर जीवनी शक्ति का ह्रास नहीं होता, यह निर्विवाद है ।
इस शरीर में जीवनी शक्ति मुख्यत: दो प्रकार के कार्य करती है । पहला शरीर में भोजन देने पर प्रथमिकतापूर्वक उसका पाचन
करती है, दूसरा शरीर में मल का शोधन करती है ।
उपवास में जब हम एक समय, एक दिन या लम्बे समय तक भोजन नहीं लेते तो जीवनी शक्ति पाचन के भार से मुक्त होकर
शरीर में जमा मल का शोधन करती है और ईश्वरीय प्राण शक्ति का प्रकट्य होता है । इसप्रकार उपवास के सिद्धान्त को
समझकर प्रयोग करने से जीवनी शक्ति जाग्रित होगी तथा आरोग्य के साथ साथ ईश्वरीय शक्ति व आनन्द की भी अनुभूति होगी ।।
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